बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 894 of 1402
Read in contextPage 894
८८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४
| संस्कृत भाष्य | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| किं पुनस्तच्छान्तायां वाचि ज्योतिर्भवति ? इत्युच्यते—<br><br>आत्मैवास्य ज्योतिर्भवतीति ।<br><br>आत्मेति कार्यकारणस्वावयवसंघातव्यतिरिक्तं कार्यकारणावभासकम्, आदित्यादिबाह्यज्योतिर्वत् स्वयमन्येनानवभास्यमानमभिधीयते ज्योतिः; अन्तःस्थं च तत् पारिशेष्यात्—कार्यकरणव्यतिरिक्तं तदिति तावत् सिद्धम्; यच्च कार्यकरणव्यतिरिक्तं कार्यकरणसंघातानुग्राहकं च ज्योतिस्तद् बाह्यैश्चक्षुरादिकरणैरुपलभ्यमानं दृष्टम्; न तु तथा तच्चक्षुरादिभिरुपलभ्यते, आदित्यादिज्योतिःषूपरतेषु; कार्यं तु ज्योतिषो दृश्यते यस्मात्, तस्मादात्मनैवायं ज्योतिषा आस्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति; तस्मान्नूनमन्तःस्थं ज्योतिरित्यवगम्यते । किं च आदित्यादिज्योतिर्विलक्षणं तदभौतिकं च; स एव | किंतु उस वाणीके शान्त होनेपर कौन ज्योति होती है ? सो बतलाया जाता है—उस समय आत्मा ही इस पुरुषकी ज्योति होता है। आत्मा—यह देहेन्द्रियरूप अपने अवयवसंघातसे व्यतिरिक्त, देह और इन्द्रियोंका अवभासक तथा आदित्यादि बाह्य ज्योतियोंके समान स्वयं किसी अन्यसे भासित न होनेवाली ज्योति कहा जाता है। तथा [किन्हीं बाह्य ज्योतियोंमें न होनेके कारण] वह पारिशेष्य न्यायसे अन्तःस्थ है; वह देह और इन्द्रियोंसे भिन्न है—यह तो सिद्ध ही हो चुका है; और जो ज्योति देहेन्द्रियसे भिन्न तथा देहेन्द्रियसंघातकी उपकारक होती है, वह नेत्रादि बाह्य इन्द्रियोंसे उपलब्ध होती देखी जाती है; किंतु आदित्यादि ज्योतियोंके निवृत्त हो जानेपर यह आत्मा उनकी तरह चक्षु आदिसे उपलब्ध नहीं होता; किंतु तो भी चूँकि ज्योतिका कार्य देखा ही जाता है, इसलिये यह पुरुष आत्मज्योतिसे ही बैठता, इधर उधर जाता, कर्म करता और फिर लौट आता है; अतः यह ज्ञात होता है कि निश्चय ही आत्मा अन्तःस्थ ज्योति है; यही नहीं, वह आदित्यादि ज्योतियोंसे विलक्षण और अभौतिक भी है; यही |