बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 936 of 1402
Read in context| ९२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ४ |
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| रित्यर्थः, संसृज्यते संयुज्यते, स एवोत्क्रामञ्छरीरान्तरमूर्ध्वं क्रामन् गच्छन् म्रियमाण इत्येतस्य व्याख्यानमुत्क्रामन्निति। <br><br> तानेव संश्लिष्टान् पाप्मरूपान् कार्यकरणलक्षणान्, विजहाति तैर्वियुज्यते, तान् परित्यजति। | और इन्द्रियोंसे संसृष्ट—संयुक्त हो जाता है। तथा वही उत्क्रमण करते समय—शरीरान्तरप्राप्तिके लिये ऊपरकी ओर जाते समय, श्रुतिमें ‘म्रियमाणः’ (मरते समय) इस पदकी ही व्याख्या ‘उत्क्रामन्’ इस पदसे की गयी है, उन संश्लिष्ट देहेन्द्रियरूप पापरूपोंको त्याग देता है उनसे वियुक्त हो जाता है अर्थात् उन्हें छोड़ देता है। | | यथायं स्वप्नजाग्रद्वृत्त्योर्वर्तमाने एवैकस्मिन् देहे पाप्मरूपकार्यकरणोपादानपरित्यागाभ्यामनवरतं संचरति धिया समानः सन्, तथा सोऽयं पुरुषः उभाविहलोकपरलोकौ जन्ममरणाभ्यां कार्यकरणोपादानपरित्यागौ अनवरतं प्रतिपद्यमानः, आ संसारमोक्षात्संचरति। तस्मात् सिद्धमस्य आत्मज्योतिषोऽन्यत्वं कार्यकरणरूपेभ्यः पाप्मभ्यः, संयोगवियोगाभ्याम्, न हि तद्धर्मत्वे सति, तैरेव संयोगो वियोगो वा युक्तः ॥८॥ | जिस प्रकार यह जीव, इस एक वर्तमान शरीरमें ही बुद्धिकी समानताको प्राप्त होकर स्वप्न और जाग्रत् दोनों वृत्तियोंमें पापरूप देह तथा इन्द्रियोंका ग्रहण और त्याग करता हुआ निरन्तर संचार करता रहता है, उसी प्रकार यह पुरुष जन्म और मरणके द्वारा देहेन्द्रियका निरन्तर ग्रहण और त्याग करता हुआ इहलोक और परलोक दोनोंमें तबतक संचार करता रहता है, जबतक इस संसार-बन्धनसे मुक्त नहीं हो जाता। अतः इन संयोग और वियोगके कारण इस आत्मज्योतिका देहेन्द्रियरूप पापोंसे अन्यत्व सिद्ध होता है; उन्हींका धर्म होनेपर तो इसका उन्हींसे संयोग या वियोग होना बन ही नहीं सकता ॥ ८ ॥ |