बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished1,402 pages
Page 95 of 1402
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ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थ [८९
| संस्कृत | हिन्दी |
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| पत्याः प्रजापतेर्वृत्तजन्मावस्थस्यापत्यानि प्राजापत्याः। के ते? देवाश्चासुराश्च। तस्यैव प्रजापतेः प्राणा वागादयः। | घटित हुआ था उसमें होनेवाले प्रजापतिके पुत्र प्राजापत्य कहे गये हैं। वे कौन थे? देवता और असुर; अर्थात् उसी प्रजापतिके वागादि प्राण [इन्द्र-विरोचनादि नहीं]। |
| कथं पुनस्तेषां देवासुरत्वम् ?<br><br>(प्राणानां देवासुरत्व-निर्वचनम्)<br>उच्यते—शास्त्रजनितज्ञानकर्मभाविता द्योतनाद्देवा भवन्ति। त एव स्वाभाविकप्रत्यक्षानुमानजनितदृष्टप्रयोजनकर्मज्ञानभाविता असुराः। स्वेष्वेवासुषु रमणात् सुरेभ्यो वा देवेभ्योऽन्यत्वात्। | किंतु उनका देवासुरत्व कैसे माना जाता है? सो बतलाया जाता है। शास्त्र-जनित ज्ञान और कर्मसे भावित जो प्राण हैं, वे द्योतनशील (प्रकाशमय) होनेके कारण देव हैं; तथा वे (प्राण) ही स्वाभाविक प्रत्यक्ष एवं अनुमानजनित दृष्ट प्रयोजनवाले कर्म और ज्ञानसे भावित होनेपर असुर हैं। अपने ही असुओं (प्राणों) में रमण करनेके कारण अथवा सुर यानी देवोंसे भिन्न होनेके कारण वे असुर कहलाते हैं। |
| यस्माच्च दृष्टप्रयोजनज्ञानकर्मभाविता असुराः, ततस्तस्मात्कानीयसाः, कनीयांस एव कानीयसाः, स्वार्थेऽणि वृद्धिः। कनीयांसोऽल्पा एव देवाः। ज्यायसा | क्योंकि असुरगण दृष्ट प्रयोजन-वाले ज्ञान और कर्मकी भावनासे युक्त हैं, इसलिये देवगण कानीयस हैं। कनीयान् ही कानीयस हैं। यहाँ [कनीयस् शब्दसे] स्वार्थमें 'अण्' प्रत्यय होनेपर आदि स्वरकी वृद्धि हुई है, जिससे 'कानीयस' शब्द सिद्ध हुआ है। तात्पर्य यह कि देवगण कनीयान् अर्थात् थोड़े |