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बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished1,402 pages

Page 958 of 1402

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Page 958
९४४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ४

| वात् कश्चिद् विमुच्यते; अथ स्वभावो न भवति मृत्युः, ततस्तस्मान्मोक्ष उपपत्स्यते । यथासौ मृत्युरात्मीयो धर्मो न भवति, तथा प्रदर्शनाय अत ऊर्ध्वं विमोक्षाय ब्रूहीत्येवं जनकेन पर्यनुयुक्तो याज्ञवल्क्यस्तद्दिदर्शयिषया प्रववृते— | भी मुक्ति नहीं हो सकती, यदि मृत्यु स्वभाव न हो तभी उससे मोक्ष होना सम्भव होगा। जिस प्रकार यह मृत्यु आत्माका धर्म नहीं है, वह दिखानेके लिये 'अब आगे मोक्षके लिये उपदेश कीजिये' इस प्रकार जनकद्वारा प्रश्न किये जानेपर याज्ञवल्क्यजी उसे दिखानेकी इच्छासे प्रवृत्त हुए। |

सुषुप्तिके भोगसे आत्माकी असङ्गता

स वा एष एतस्मिन् सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च । पुनः प्रतिन्यायं प्रतियोन्याद्रवति स्वप्नायैव स यत्तत्र किञ्चित् पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुष इत्येवमेवैतद् याज्ञवल्क्य सोऽहं भगवते सहस्रं ददाम्यत ऊर्ध्वं विमोक्षायैव ब्रूहीति ॥ १५ ॥

वह यह आत्मा इस सुषुप्तिमें रमण और विहार कर पुण्य और पापको केवल देखकर, जैसे आया था और जहांसे आया था, पुनः स्वप्नस्थानको ही लौट आता है। वहाँ वह जो कुछ देखता है, उससे असम्बद्ध रहता है; क्योंकि यह पुरुष असङ्ग है। [ जनक— ] 'याज्ञवल्क्य ! यह बात ऐसी ही है, मैं श्रीमान्‌को सहस्र मुद्रा देता हूँ, इससे आगे भी मोक्षके लिये ही उपदेश कीजिये' ॥ १५ ॥

| स वै प्रकृतः स्वयंज्योतिः पुरुषः, एष यः स्वप्ने प्रदर्शितः, एतस्मिन् सम्प्रसादे—सम्यक् प्रसी- | वह यह प्रकृत स्वयंज्योति पुरुष, जिसे कि स्वप्नावस्थामें प्रदर्शित किया है, इस सम्प्रसादमें—इसमें पुरुष |