बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
by महर्षि व्यास
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context( १० ) हरिभक्तिपरो वापि हरिध्यानरतोऽपि वा । भ्रष्टो यः स्वाश्रमाचारात् पतितः सोऽभिधीयते ।। वेदो वा हरिभक्तिर्वा भक्तिर्वापि महेश्वरे । आचारात्पतितं मूढं न पुनाति द्विजोत्तमम् ।। (पूर्व० ४, २४-२५) यः स्वधर्मं परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति । न तस्य तुष्यते विष्णुश्चारेणैव तुष्यति ।। तस्मात् कार्या हरेर्भक्तिः स्वधर्मस्याविरोधिनी । स्वधर्महीना भक्तिश्चाप्यकृतैव प्रकीर्तिता ।। (पूर्व० १५, १२३, १२४) यह पुराण एकादशी व्रत के अनुष्ठान का माहात्म्य बड़े विस्तार से प्रभावक शब्दों में वर्णन करता है। यहाँ परम वैष्णव रुक्मांगद राजा का उल्लेख है, जिन्होंने अपने राज्य में आठ वर्ष से लेकर अस्सी वर्ष वय वाले व्यक्तियों के लिए आदेश जारी कर रखा था कि इनमें जो एकादशी का व्रत नहीं करेगा वह वध्य माना जाएगा। यह पुराण अग्निपुराण तथा गरुड़पुराण के समान समस्त विद्याओं का प्रतिपादन करने वाला विश्व- कोश के समान है। इन विद्याओं के प्रतिपादक किसी मान्य ग्रन्थ का संक्षेप यहाँ प्रस्तुत किया गया है कृतज्ञता-ज्ञापन लगभग ४० वर्ष पहले नारदीयपुराण (आनन्दाश्रम पूना संस्करण) का अपूर्ण हिन्दी अनुवाद हमने किया था। उसके बाद सम्मेलन में शासनतन्त्र बदल जाने से बहुत वर्षों तक पुराण-कार्य स्थगित रहा। पुनः श्री प्रभात शास्त्री के प्रशासनकाल में यह कार्य पुनरुज्जीवित हुआ। शास्त्री जी का दृढ़संकल्प है कि वे जब तक सम्मेलन में रहेंगे तब तक पुराणों का प्रकाशन निर्बाध गति से चलता रहेगा। उनके इस सत्य संकल्प के लिए जितना साधुवाद और धन्यवाद दिया जाय, वह कम ही होगा। शास्त्रीजी ने मुझे इस पुण्य कार्य का भार सौंपा, अतः मैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ। ऊपर संकेत के अनुसार मुझे अपूर्ण हिन्दी अनुवाद को पूर्ण करने में बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ा; कारण जिस संस्करण से इसका अनुवाद किया था, वह संस्करण प्रेस में देने से पूर्व मुझे नहीं मिला। नारदीय- पुराण की खोजबीन करने पर प्रयागस्थ पं० श्री महादेवप्रसाद पाठक'वैद्य जी से नारदीय पुराण (बम्बई संस्करण) की एक प्रति प्राप्त हुई। उसकी 'फोटो स्टेट' कापी कराकर हमने प्रेस में दी। पाठकजी की इस उदारता के लिए हम उनके प्रति अपना आभार प्रकट करते हैं। अनुवाद-कार्य को पूर्ण करने में मुझे कल्याण के 'नारद विष्णु पुराण अंक' से बहुत सहायता मिली। अतः मैं 'कल्याण' के कर्णधारों के प्रति अपनी हार्दिक कार्तज्ञ्य ज्ञापित करता हूँ। जैसा कि मैंने ऊपर संकेत किया है कि इसका अनुवाद पूना संस्करण से और संशोधन बम्बई संस्करण से किया गया है, इससे कुछ स्थलों पर पाठभिन्नता के कारण भावानुवाद ही करना पड़ा। कुछ कारणवश मंत्र-संशो- धन और मन्त्रोद्धार भी सब जगह नहीं कर सका। इसके लिए मैं पाठकों से क्षमा चाहता हूँ। यदि इसके दूसरे संस्करण तक मैं क्रियाशील रहा तो इस कमी को पूर्ण करने का भरसक प्रयास करूँगा। 'करकृतमपराधं क्षन्तुम- र्हन्ति सन्तः' इस अभ्यर्थना के साथ अपना निवेदन समाप्त करता हूँ। मौनी अमावास्या सन् १९८६ निवेदक तारिणीश झा