छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 420 of 978
Read in contextचतुर्दश खण्ड
आचार्यका आगमन
ते होचुरुपकोसलैषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या चाचार्यस्तु ते गतिं वक्तेत्याजगाम हास्याचार्यस्तमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥ १ ॥
उन्होंने कहा—'उपकोसल! हे सोम्य! यह अपनी विद्या और आत्मविद्या तेरे प्रति कही। आचार्य तुझे [इनके फलकी प्राप्तिका] मार्ग बतलावेंगे।' तदनन्तर उसके आचार्य आये। उससे आचार्यने कहा—'उपकोसल!' ॥ १ ॥
| ते पुनः संभूयोचुर्होपकोसलैषा सोम्य ते तवास्मद्विद्याग्निविद्येत्यर्थः । आत्मविद्या पूर्वोक्ता प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति च । आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता विद्याफलप्राप्तय इत्युक्त्वोपेरेमुरग्नयः । आजगाम हास्याचार्यः कालेन । तं च शिष्यमाचार्योऽभ्युवादोपकोसल ३ इति ॥१॥ | तब उन्होंने पुनः एक साथ कहा—'उपकोसल! हे सोम्य! यह हमने तेरे प्रति अपनी विद्या अर्थात् अग्निविद्या और आत्मविद्या—जो पहले 'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इत्यादि रूपसे कही गयी है कह दी। अब इस विद्याके फलकी प्राप्तिके लिये आचार्य तुझे मार्ग बतलावेंगे।' ऐसा कहकर अग्निगण उपरत हो गये। कालान्तरमें उसके आचार्य आये तब आचार्यने उस अपने शिष्यसे कहा—'उपकोसल!' ॥ १ ॥ |