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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 576 of 978

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Page 576

५७२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५ ]


| कुर्यादात्मनि हैवास्य चण्डालदेहस्थे वैश्वानरे तद्धुतं स्यान्नाधर्मनिमित्तमिति विद्यामेव स्तौति। तदेतस्मिन्स्तुत्यर्थे श्लोको मन्त्रोऽप्येष भवति ॥ ४ ॥ | करे तो भी वह चाण्डालके देहमें स्थित वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा, अधर्मका हेतु नहीं होगा—ऐसा कहकर श्रुति विद्याकी ही स्तुति करती है। उस इस स्तुतिके विषयमें यह श्लोक यानी मन्त्र भी है ॥४॥ |


यथेह क्षुधिता बाला मातरं पर्युपासत एवँसर्वाणि भूतान्यग्निहोत्रमुपासत इत्यग्निहोत्रमुपासत इति ॥५॥

जिस प्रकार इस लोकमें भूखे बालक सब प्रकार माताकी उपासना करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी इस ज्ञानीके भोजनरूप अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं, अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं ॥ ५ ॥

| यथेह लोके क्षुधिता बुभुक्षिता बाला मातरं पर्युपासते कदा नो मातान्नं प्रयच्छतीति, एवं सर्वाणि भूतान्यन्नादान्येवंविदोऽग्निहोत्रं भोजनमुपासते कदा न्वसौ भोक्ष्यत इति; जगत्सर्वं विद्वद्भोजनेन तृप्तं भवतीत्यर्थः। द्विरुक्तिरध्यायपरिसमाप्त्यर्था ॥ ५ ॥ | जिस प्रकार इस लोकमें क्षुधित-भूखे बालक सब प्रकार माताकी उपासना (प्रतीक्षा) करते हैं कि माता हमें कब अन्न देगी ? उसी प्रकार अन्न भक्षण करनेवाले समस्त प्राणी इस प्रकार जाननेवालेके अग्निहोत्र अर्थात् भोजनकी उपासना करते हैं कि यह कब भोजन करेगा, क्योंकि विद्वान्‌के भोजन करनेसे सारा जगत् तृप्त होता है—यह इसका तात्पर्य है। यहाँ जो द्विरुक्ति है वह अध्यायकी समाप्तिके लिये है ॥५॥ |

इतिच्छान्दोग्योपनिषदि पञ्चमाध्याये चतुर्विंशखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥२४॥
इति श्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ छान्दोग्योपनिषद्द्विवरणे पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ॥ ५ ॥