छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 724 of 978
Read in context| ७२० | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ७ |
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| वन्नाम्नो गतं नाम्नो गोचरं तत्र तस्मिन्नामविषयेऽस्य यथाकामचारः कामचरणं राज्ञ इव स्वविषये भवति । यो नाम ब्रह्मेत्युपास्त इत्युपसंहारः । किमस्ति भगवो नाम्नो भूयोऽधिकतरं यद्ब्रह्मदृष्ट्यर्हमन्यदित्यभिप्रायः । सनत्कुमार आह नाम्नो वाव भूयोऽस्त्येवेत्युक्त आह यद्यस्ति तन्मे भगवान्ब्रवीत्विति ॥ ५ ॥ | नामकी गति अर्थात् नामका विषय होता है वहाँतक उस नामके विषयमें इसका कामचार—स्वेच्छाचरण हो जाता है, जैसा कि राजाके अपने विषय (अधिकृत देश) में, जो 'नाम ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है—यह उपसंहार है। [नारद—] 'भगवन् ! क्या नामसे बढ़कर भी कुछ है ? अर्थात् जो ब्रह्मदृष्टिके योग्य हो ऐसी कोई और वस्तु भी है—ऐसा इसका अभिप्राय है ?' सनत्कुमारने कहा—'नामसे बढ़कर भी है ही।' इस प्रकार कहे जानेपर नारदने कहा—'यदि है तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें' ॥ ५ ॥ |
इतिच्छान्दोग्योपनिषदि सप्तमाध्याये प्रथमखण्डभाष्यं सम्पूर्णम् ॥ १ ॥