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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 775 of 978

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Page 775

खण्ड १५] शाङ्करभाष्यार्थ ७७१

| दियुक्तं प्रत्याह तदैनं पार्श्वस्था आहुर्विवेकिनो धिक्त्वास्तु धिगस्तु त्वामित्येवम्। पितृहा वै त्वं पितुर्हन्तेत्यादि ॥ २ ॥ | है तो उसके समीपवर्ती विचारशील लोग उससे 'धिक्त्वास्तु'—तुझे धिक्कार है—ऐसा कहते हैं। 'तू निश्चय ही पितृहा—पिताका हनन करनेवाला है' इत्यादि ॥ २ ॥ |


अथ यद्यप्येनानुत्क्रान्तप्राणाञ्छूलेन समासं व्यतिषंदहेन्नैवैनं ब्रूयुः पितृहासीति न मातृहासीति न भ्रातृहासीति न स्वसृहासीति नाचार्यहासीति न ब्राह्मणहासीति ॥ ३ ॥

किंतु जिनके प्राण उत्क्रमण कर गये हैं उन पिता आदिको यदि वह शूलसे एकत्रित और छिन्न-भिन्न करके जला दे तो भी उससे 'तू पितृहा है' 'तू मातृहा है' 'तू भ्रातृहा है' 'तू बहिनकी हत्या करनेवाला है' 'तू आचार्यका घात करनेवाला है' अथवा 'तू ब्रह्मघाती है' ऐसा कुछ नहीं कहते ॥ ३ ॥

| अथैनानेवोत्क्रान्तप्राणांस्त्यक्तदेहानथ यद्यपि शूलेन समासं समस्य व्यतिषन्दहेद्यत्यस्य सन्दहेदेवमप्यतिक्रूरं कर्म समास-व्यासादिप्रकारेण दहनलक्षणं तद्देहसम्बद्धमेव कुर्वाणं नैवैनं ब्रूयुः पितृहेत्यादि। तस्मादन्वयव्यतिरेकाभ्यामवगम्यत एतत्पित्राद्याख्योऽपि प्राण एवेति ॥ ३॥ | किंतु प्राण निकल जानेपर—देहका त्याग कर देनेपर इन्हींको यदि वह शूलसे समास—एकत्रित करके व्यतिषन्दहन करे अर्थात् छिन्न-भिन्न करके जलावे; उनके देहसे सम्बद्ध समास-व्यासादि क्रमसे दहन करारूप ऐसा अत्यन्त क्रूर कर्म करनेपर भी उससे 'तू पितृहा है' इत्यादि नहीं कहते। अतः अन्वय-व्यतिरेकसे यह ज्ञात होता है कि यह पिता आदि नाम-वाला भी प्राण ही है ॥ ३ ॥ |

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छा० उ० २५—