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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 893 of 978

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Page 893

खण्ड ९ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ८८९


हस्तश्छिन्नपादो वा । स्रामे परिवृक्णे वा देहे छायात्मापि तथा भवति । तथास्य देहस्य नाशमन्वेष नश्यति ॥ १ ॥कट गये हों। शरीरके स्राम या परिवृक्ण होनेपर छायात्मा भी वैसा ही हो जाता है; तथा इस देहका नाश होनेपर यह भी नष्ट हो जाता है ॥ १ ॥
अतः—अतः—

नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति स समित्पाणिः पुनरे- याय तꣳह प्रजापतिरुवाच मघवन्यच्छान्तहृदयः प्राव्रा- जीः सार्धं विरोचनेन किमिच्छन् पुनरागम इति स होवाच यथैव खल्वयं भगवोऽस्मिञ्छरीरे साध्वलङ्कृते साध्वलङ्कृतो भवति सुवसने सुवसनः परिष्कृते परिष्कृत एवमेवायमस्मिन्नन्धेऽन्धो भवति स्रामे स्रामः परिवृक्णे परिवृक्णोऽस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति नाहमत्र भोग्यं पश्यामीति ॥ २ ॥

‘इस [छायात्मदर्शन] में मैं कोई भोग्य नहीं देखता।’ इसलिये वे समित्पाणि होकर फिर प्रजापतिके पास आये। उनसे प्रजापतिने कहा—‘इन्द्र! तुम तो विरोचनके साथ शान्तचित्त होकर गये थे, अब किस इच्छासे पुनः आये हो?’ उन्होंने कहा—‘भगवन्! जिस प्रकार यह (छायात्मा) इस शरीरके अच्छी तरह अलंकृत होनेपर अच्छी तरह अलंकृत होता है, सुन्दर वस्त्रधारी होनेपर सुन्दर वस्त्रधारी होता है और परिष्कृत होनेपर परिष्कृत हो जाता है उसी प्रकार इसके अंधे होनेपर अंधा, स्राम होनेपर स्राम और खण्डित होनेपर खण्डित भी हो जाता है तथा इस शरीरका नाश होनेपर यह नष्ट भी हो जाता है, मुझे इसमें कोई फल दिखायी नहीं देता’ ॥ २ ॥