चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० २२ ] सूत्रस्थानम् २६१ बलं पुष्ट्युपलब्धश्च कार्श्यदोषविवर्जनम् । लक्षणं बृंहिते, स्थौल्यमति चाल्यर्थबृंहिते ॥ ३८ ॥ बल, पुष्टि का होना, कृशता के दोषों का दूर हो जाना, ये सम्यक् प्रकार के बृंहण होने के लक्षण हैं । बृंहण के अतियोग से स्थूलता आती है ॥ ३८ ॥ कृताकृतस्य लिङ्गं यल्लङ्गिते तद्धि रूक्षिते । लंघन के सम्यक् योग और अयोग के जो लक्षण हैं वे ही लक्षण रूक्षण के सम्यक् योग और अयोग के हैं । स्तम्भितः स्याद्बले लब्धे यथोक्तैश्चाऽऽमयैर्जितैः ॥ ३९ ॥ श्यावता स्तब्धगात्रत्वमुद्वेगो हनुसंग्रहः । हृद्धोर्विनिग्रहश्च स्यादतिस्तम्भितलक्षणम् ॥ ४० ॥ स्तम्भन क्रिया के योग्य रोगों के शान्त होने पर, बल प्राप्त होने से स्तम्भन भली प्रकार से हुआ जानना चाहिये । स्तम्भन के अतियोग से—काला रंग, शरीर का जड़ होना, वमन की इच्छा, जबड़ी का बन्द होना, हृदय का अव- रोध, मल का रुकना ये अतिस्तम्भन के लक्षण हैं ॥ ३९-४० ॥ लक्षणं चाकृतानां स्यात् षण्णामेषां समासतः । तदौषधानां व्याधीनामशमो वृद्धिरैव च ॥ ४१ ॥ इति षट् सर्वरोगाणां प्रोक्ताः सम्यगुपक्रमाः । साध्यानां साधने सिद्धा मात्राकालानुरोधिनः ॥ ४२ ॥ इति । भवति चात्र—दोषाणां बहुसंसर्गात् संकीर्यन्ते ह्यपक्रमाः । षडृत्वं तु नातिवर्तन्ते त्रित्वं वातादयो यथा ॥ ४३ ॥ तत्र श्लोकः—इत्यग्निलङ्घनाध्याये व्याख्याताः षडुपक्रमाः । यथाप्रश्नं भगवता चिकित्सा यैः प्रवर्तिता ॥ ४४ ॥ लंघन आदि छः क्रियाओं के अयोग से, इन क्रियाओं से शान्त होने वाले रोगों की शान्ति नहीं होती या बढ़ जाते हैं । इन छः क्रियाओं के सम्यक् योग से सब रोग शान्त हो सकते हैं । मात्रा और समय का विचार करके इन क्रियाओं का उपयोग करने से सब साध्य रोग ठीक होते हैं । वातादि दोषों के परस्पर मिलने से बहुत भेद हो जाते हैं, इसलिये चिकित्सा भी बहुत प्रकार की है । जिस प्रकार कि रोग वात आदि तीन को छोड़कर नहीं होते उसी प्रकार चिकित्सा भी इन छः में ही सीमित है । इस लंघनीय अध्याय में छः क्रियायें प्रश्न के अनुसार भगवान् आत्रेय ने कह दी हैं ॥ ४१-४४ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के लङ्घनबृंहणीयो नाम द्वाविंशतितमोऽध्यायः ॥ २२ ॥