चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context१२ चरकसंहिता [ अ० १ अपने गुणों से पृथक् न होना 'समवाय' १ है । अर्थात् द्रव्य गुणों के बिना नहीं रह सकते और गुण बिना द्रव्य के नहीं रह सकते । यह समवाय सम्बन्ध नित्य है, (संयोग की तरह अनित्य नहीं) क्योंकि जहां पर द्रव्य है, वहां पर गुण नहीं रहता ऐसा नहीं, अपितु निश्चित ही है। जहां द्रव्य है वहां गुण भी है। इस लिये द्रव्य और गुण का नियत सम्बन्ध होने से इनका सम्बन्ध भी नियत ही है ॥ ५० ॥ द्रव्य का लक्षण— यत्राऽऽश्रिताः कर्मगुणाः कारणं समवायि यत् । तद् द्रव्यं, जिसमें कर्म और गुण आश्रित हैं, और जो समवायि कारण है, वह 'द्रव्य' है। गुण का लक्षण:— समवायी तु निश्चेष्टः कारणं गुणः ॥ ५१ ॥ द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध वाला, निश्चेष्ट (निष्क्रिय) एवं कारणवान् गुण है। गुण-निर्गुण होते हैं, गुण में गुण नहीं होता, जैसा कि लिखा है— “गुणा गुणाश्रया नोक्ताः” ॥ ५१ ॥ कर्म्म का लक्षण - संयोगे च वियोगे च कारणं द्रव्यमाश्रितम् । कर्त्तव्यस्य क्रिया कर्म कर्म नान्यदपेक्षते ॥ ५२ ॥ जो कि द्रव्य का आश्रय लेकर रहता है, तथा संयोग और विभाग में कारण है, उसका नाम 'कर्म' है । कर्म किसी अन्य कर्म की अपेक्षा नहीं करता [द्रव्य और गुण परस्पर एक दूसरे के समवाय की अपेक्षा करके कारण बनते हैं] तथा—कर्त्तव्य कार्य का अनुष्ठान रूप कर्म है। “एकं द्रव्यमगुणं संयोगविभागेष्वनपेक्षं कारणमिति कर्म्मलक्षणम्” वैशे० किये हुवे सद्वृत्त, शान्ति, मंगल—पाठ आदि अनुष्ठान भी कर्म्म हैं, ये अध्यात्म कर्म हैं ॥ ५२ ॥ इत्युक्तं कारणं, कार्यं धातुसाम्यमिहोच्यते । धातुसाम्यक्रिया चोक्ता तन्त्रस्यास्य प्रयोजनम् ॥ ५३ ॥ १ समवाय का लक्षण - अयुतसिद्धानां [जो कभी भी पृथक् नहीं होते] आधाराधारभूतानां इहेति प्रत्ययहेतुः सम्बन्धः स समवायः । वैशे० जैसे तन्तु और वस्त्र का या मिट्टी और घड़े का समवाय सम्बन्ध है ।