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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

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अ० १ ] २ सूत्रस्थानम् १७ शमन करता है और (२) कुछ द्रव्य शरीरको धारण करनेवाले वात आदि वा रस आदि को दूषित वा कुपित करते हैं और (३) कुछ द्रव्य स्वास्थ्य का रक्षण करते हैं, वे स्वस्थ अवस्था के लिए हितकारी हैं। जैसे- लाल चावल, सांठी के चावल, जौ, जीवन्ती शाक आदि। "शमनं कोपनं स्वस्थहितं द्रव्यमिति त्रिधा ॥" वाग्भटः ॥ तत्पुनस्त्रिविधं ज्ञेयं जाङ्गमौद्भिदपार्थिवम् । मधूनि गोरसाः पित्तं वसा मज्जासृगामिषम् ॥ ६८ ॥ विण्मूत्रं चर्म रेतोऽस्थि स्नायुः शृङ्गं खुरा नखाः । जङ्गमेभ्यः प्रयुज्यन्ते केशा लोमानि रोचनाः ॥ ६६ ॥ द्रव्य फिर तीन प्रकार के हैं ( १ ) (जांगम) प्राणियों से उत्पन्न होने वाले, और ( २ ) ( औद्भिद ) भूमि को भेदन करके पृथिवी में से उत्पन्न होने वाले वनस्पति आदि, ( ३ ) ( पार्थिव ) भूमि से उत्पन्न होने वाले, खनिज । जंगम द्रव्य— मधु (शहद) १ गोरस, दूध, घी, आदि, पित्त, वसा (चर्बी), मज्जा, रक्त, मांस, विष्ठा, मूत्र, चर्म, वीर्य, अस्थि, स्नायु, सींग, नख, खुर, (केश) शिर के बाल, ( रोम ) शरीर के बाल, रोचना अर्थात् गोरोचना, ये जांगम-प्राणियों से लेकर व्यवहार में लाये जाते हैं ॥ ६८-६६ ॥ भौम द्रव्य— सुवर्णं समलाः पञ्च लोहाः ससिकताः सुधा । मनःशिलाले मणयो लवणं गैरिकाञ्जने ॥ ७० ॥ भौममौषधमुद्दिष्टम्, औद्भिदं तु चतुर्विधम् । वनस्पतिर्वीरुधश्च वानस्पत्यस्तथौषधिः ॥ ७१ ॥ स्वर्ण, और इसका मल (शिलाजीत) पांच प्रकार के लोह जैसे रांगा, सीसा ताम्बा, चांदी और लोहा, (सिकता) बालू, (सुधा) चूना, पार्थिव विष, मनः शिला, (आल) हरताल, (मणि) स्फटिक आदि, लवण सैन्धव आदि, [ गैरिक ] गेरू, ( अंजन ) सुरमा, ये पार्थिव औषध कहे हैं औद्भिद द्रव्य चार प्रकार के हैं। वनस्पति, वीरुत् , वानस्पत्य और ओषधि ॥ ७०-७१ ॥ फलैर्वनस्पतिः, पुष्पैर्वानस्पत्यः फलैरपि । ओषध्यः फलपाकान्ताः, प्रतानैर्वीरुधः स्मृताः ॥ ७२ ॥ (१) जिनमें बिना पुष्प के फल आता है, वे 'वनस्पति' हैं, जैसे गूलर, वट १. माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तिकं मधुजातयः ।