चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० १ ] सूत्रस्थानम् २१ है (२) सौवर्चल ( संचल ), (३) (विड) काला नमक, (४) ( औद्भिद ) काच नमक और (५) सामुद्र, समुद्र के पानी से तैयार किया हुआ, ये पांच प्रकार के लवण या नमक हैं॥ ८८ ॥ लवणों के कर्म - स्निग्धान्युष्णानि तीक्ष्णानि दीपनीयतमानि च ॥ ८९ ॥ आलेपनार्थे युज्यन्ते स्नेहस्वेदविधिषु तथा । अधोभागोर्ध्वभागेषु निरूहेष्वनुवासने ॥ ९० ॥ अभ्यञ्जने भोजनार्थे शिरसश्च विरेचने । शस्त्रकर्मणि वस्त्यर्थमञ्जनोत्सादनेषु च ॥ ९१ ॥ अजीर्णानाहवार्तेषु गुल्मे शूले तथोदरे । उक्तानि लवणानि, ऊर्ध्वं मूत्राण्यष्टौ निबोध मे ॥ ९२ ॥ ये नमक स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण और दीपनीय अर्थात् विशेष रूप से अग्नि बढ़ानेवाले हैं। ये नमक आलेपन में, स्नेहन में, और स्वेदन कार्य में, अधोभाग- विरेचन और ऊर्ध्व-विरेचन द्वारा दोषों को बाहर निकालने में, निरूहण में, अनु- वासन में, अभ्यङ्ग में, भोजन में, और शिर के विरेचन में, शस्त्र कर्म में, वर्त्ति अर्थात् फल वर्त्ति आदि में, अञ्जन में, उबटन में, अजीर्ण में, अफारे में, वायु रोग में, गुल्म में, शूल रोग में, और उदर रोगों में प्रयोग किये जाते हैं। ये पांचों प्रकार के नमक कह दिये ॥ ८९-९२ ॥ आठ मूत्र— मुख्यानि यानि ह्यष्टानि सर्याण्यात्रेयशासने । अविमूत्रमजामूत्रं गोमूत्रं माहिषं तथा ॥ ९३ ॥ हस्तिमूत्रमथोष्ट्रस्य हयस्य च खरस्य च । अब जो मुख्य आठ मूत्र आत्रेय ऋषि ने कहे हैं वे सुनिये— (१) भेड़ का मूत्र, (२) बकरी का मूत्र, (३) गाय का मूत्र, (४) भैंस का मूत्र, (५) हाथी का मूत्र, (६) ऊँट का मूत्र, (७) घोड़े का मूत्र और (८) गधे का मूत्र ये आठ प्रकार के मूत्र हैं१ ॥ ९३ ॥ मूत्रों के सामान्य गुण— उष्णं तीक्ष्णमथो रूक्षं कटुकं लवणान्वितम् ॥ ९४ ॥ मूत्रमुत्सादने युक्तं युक्तमालेपनेषु च । १. गोऽजाविमहिषीणां तु स्त्रीणां मूत्रं प्रशस्यते । खरोष्ट्रेभनराश्वानां पुंसां मूत्रं हितं स्मृतम्॥” भावप्रकाश ।