चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextतृष्णाघ्नं दीपनीयं च श्रेष्ठं क्षीणक्षतेषु च ॥ १०६ ॥ पाण्डुरोगेऽम्लपित्ते च शोषे गुल्मे तथोदरे । अतीसारे ज्वरे दाहे श्वयथौ च विधीयते ॥ ११० ॥ योनिशुक्रप्रदोषेषु मूत्रेषु प्रदरेषु च । पुरीषे ग्रथिते पथ्यं वातपित्तविकारिणाम् ॥ १११ ॥ सब दूध प्रायः १ मधुर रस, स्निग्ध, शीत, (स्तन्य) दूध बढ़ाने वाले, (प्रीणन) पुष्टि देने वाले, (बृंहण) शरीर को बढ़ाने वाले; (वृष्य) वीर्य- वर्धक, (मेध्य) बुद्धि के लिये हितकारी, (बल्य) शरीर को बल देने वाले, (मनस्कर) मन को प्रसन्न करने वाले, (जीवनीय) जीवन के लिये हितकारी, (श्रमहर) थकावट को मिटाने वाले, श्वास और कास (कफ, कास को छोड़- कर शेष समस्त कासों को) मिटाने वाले हैं। दूध रक्त पित्त को नाश करता और टूटे हुए को जोड़ने वाला है, सब प्राणियों के लिये सात्म्य दोषों को शमन अर्थात् स्वस्थान में स्थित दोषों को शान्त करने वाला है, प्यास को नाश करने वाला, अग्नि वर्धक, क्षीण और क्षत रोगियों के लिये हितकारी, पाण्डु रोग वातपित्त, शोष, गुल्म, उदर अतीसार ज्वर (जीर्ण ज्वर), दाह, (श्वयथु) शोथ रोग में विशेष करके पथ्य है। योनि रोगों में, शुक्र दोषों में, मूत्रकृच्छ्र रोग में, मलावरोध में; पथ्य और हितकारी है। वह वात-पित्त रोगियों के लिये भी पथ्य है ॥ १०७-१११॥ दूध के कर्म कहते हैं:— नस्यालेपावगाहेषु वमनास्थापनेषु च । विरेचने स्नेहने च पयः सर्वत्र युज्यते ॥ ११२ ॥ यथाक्रमं क्षीरगुणानेकैकस्य पृथक्पृथक् । अन्नपानादिकेऽध्याये भूयो वक्ष्याम्यशेषतः ॥ ११३ ॥ यह दूध नस्य कर्म में, अवगाहन क्रिया में, आलेपन में, वमन में, आस्था- पन में, बस्ति में, विरेचन में, स्नेह कर्म में, सब स्थानों पर रसायन अर्थात् वाजीकरण आदि में भी प्रयुक्त होता है। यहां पर आठों प्रकार के दूधों के गुण-कर्म सामान्य रूप में कह दिये हैं। आगे 'अन्न पान विधि' नामक अध्याय (सूत्रस्थान अ० २७) में क्रमानुसार प्रत्येक दूध के गुण-कर्म पृथक् पृथक् सम्पूर्ण रूप से कहेंगे ॥११२-११३॥ अथापरे त्रयो वृक्षाः पृथग्ये फलमूलिभिः । १ प्रायः शब्द से ऊँटनी के दूध का निषेध है। ऊँटनी का दूध नमकीन है।