चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ३ ] निदानस्थानम् ४२६ गुल्म के भेद—गुल्म पांच प्रकार के होते हैं। जैसे ( १ ) वातगुल्म, (२) पित्तगुल्म, ( ३ ) कफगुल्म, ( ४ ) निचयगुल्म और ( ५ ) रक्तगुल्म १ । इस प्रकार कहते हुए भगवान् आत्रेय से अग्निवेश ने पूछा कि इन पांच प्रकार के गुल्मों के विषय में विशेष (भेद-ज्ञान) ज्ञान किस प्रकार करूं ? क्योंकि इनके भेदों को सम्पूर्णरूप से जाने बिना, सम्पूर्ण औषध-ज्ञान होने पर भी वैद्य रोगों के शमन करने में समर्थ नहीं होता । भगवान् आत्रेय ने उत्तर दिया—हे अग्निवेश ! उत्पत्ति, पूर्वरूप, लक्षण, वेदना और उपशय इनके भेद से भिन्न-भिन्न गुल्मों का विशेष ज्ञान होता है और इन्हीं साधनों से दूसरे अन्य रोगों का भी पता चलता है। इसलिये गुल्म के लक्षण आदि का वर्णन करते हैं, इसको ध्यान से सुनो और समझो ॥३-५॥ यदा पुरुषो वातलो विशेषेण ज्वर-वमन-विरेचनातीसाराणामन्य- तमेन कर्शनेन कर्शितो वातलमाहारमाहरति शीतं वा विशेषेणातिमात्र- मस्नेहपूर्वं वा वमनविरेचने पिबत्यनुदीर्णां वा छर्दिमुदीरयत्युदीर्णान् वात-मूत्र-पुरीष-वेगान्निरुणद्धत्यत्यशितो वा पिबति नवोदकमतिमात्र- मतिमात्रसंक्षोभिणा वा यानेन यात्यतिव्यवाय-व्यायाम-मद्यरुचिर्वाऽ- भिघातमृच्छति वा विषममशन-शयनासन-स्थान-चङ्क्रमण-सेवी भवत्य- न्यद्वा किंचिदेवंविधं विष२ममतिमात्रं व्यायामजाउमारभते, तस्याप- चाराद्वातः प्रकोपमापद्यते ॥ ६ ॥ वातगुल्म—जब वातप्रकृति का मनुष्य विशेष कर ज्वर, वमन, विरेचन और अतिसार इनमें से किसी एक के कारण कृश हो जाता है, इस स्थिति में जब वह वायुकारक आहार या अति शीतल पदार्थों का सेवन करता है, वा स्नेहन कर्म किये बिना विरेचन का उपयोग करता है, वमन की इच्छा न रहने पर भी बलात्कार से वमन करता है, अधोवायु, मल, मूत्र के उपस्थित वेगों को रोकता है, अधिक भोजन करके नवीन पानी ( बरसात में कुएं आदि का पानी ) अधिक पीता है, बहुत अधिक झकोले वाली गाड़ी वा सवारी से यात्रा करता है, स्त्री-सम्भोग और मद्य के अति उपयोग से, रुचि के अभिघात होने से, विषम स्थिति में बैठने, सोने, चलने या रहने से, इसी प्रकार के अन्य १. इन पांच गुल्मों के सिवाय तीन और भी गुल्म हैं जैसा कि आगे चिकित्सा में कहेंगे—"व्यामिश्रलिङ्गान्परांस्तु गुल्माञ्छीनादिशेद्दोषबकलरनार्थम्' । अर्थात् वातपित्तज, पित्तकफज और वातकफज । इस प्रकार से आठ प्रकार के गुल्म हैं । २. 'विषममतिमात्रं' इति च पाठः ।