चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४३२ चरकसंहिता [ अ० ३ उत्पन्न करते हैं। १पित्तगुल्म में विशेषता यह है कि प्रकुपित पित्त कुक्षि, हृदय, वक्षःस्थल और कण्ठ इन स्थानों में दाह उत्पन्न करता है। इस दाह के कारण धुंए के समान और खट्टा डकार रोगी को आता है और गुल्म के स्थान में दाह होता है, धूं आ निकलता है, गरमी रहती है, पसीना आता है, क्लिन्नता होती है, शरीर ढीला पड़ा प्रतीत होता है, स्पर्श की असह्यता रहती है और किञ्चित् रोमांच रहता है। ज्वर, भ्रम, दवथु (धक् धक् स्पन्दन), पिपासा, गले मुख और तालु में शुष्कता, मूर्च्छा, मल का पतला आना, ये उपद्रव होजाते हैं। त्वचा, नख, आँख, मूत्र और मल इनका रंग हरा या हल्दी के समान होजाता है। इसके निदान के समान गुण वाली वस्तुओं के उपयोग से रोग बढ़ता है और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है। यह पित्तगुल्म का वर्णन हुआ ॥ १० ॥ तैरेव तु कर्शनैः कर्शितस्यात्यशनादतिस्निग्ध-गुरु-मधुर-शीताशना- त्पिष्टेक्षु-क्षीर-माष-तिल-गुड-विकृति-सेवनान्मन्दक-मद्यातिपानाद्धरितका- तिप्रणयनादानूपौदक-ग्राम्य-मांसातिभक्षणात्संधारणादतिसुहित्यस्य चाति- ऽवगाढमुदपानात्संक्षोभणाद्वा शरीरस्य श्लेष्मा सह मारुतेन प्रकोप मापद्यते ॥ ११ ॥ वात के साथ कफ-प्रकोप के कारण—वातगुल्म में कहे हुए कारणों से कृश हुए व्यक्ति के अत्यन्त भोजन करने से, अतिस्निग्ध, गुरु, मधुर, शीत पदार्थों के खाने से, पीठी (उड़द आदि को पीसकर), ईख, दूध, उड़द, तिल, गुड़ इनसे बने पदार्थों के अति सेवन से, मन्दक-दही और मद्य के अति- सेवन से, हरे शाक, आनूप या जलचर प्राणियों के अथवा ग्राम्य मांस के अति सेवन से, शरीर को बहुत विक्षोभित करने से, वायु कफ के साथ मिलकर कुपित होजाता है ॥ ११ ॥ तं प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संमूर्च्छद्य तानेव गाढवेद- नाप्रकारानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे । श्लेष्मा त्वस्य शीतज्वरारो- चकाविपाकाङ्गमर्द-हर्ष-हृद्रोग-च्छर्दि-निद्रालस्य-स्तैमित्य-गौरव-शिरोभि- तापानुपजनयति, अपिच गुल्मस्य स्थैर्य-गौरव-काठिन्यावगाढ-सुप्तताः, १. आमाशय के एकदेश में मूर्च्छित होने से पित्तगुल्म और कफगुल्म बस्ति में नहीं होते। क्योंकि नाभि और स्तनों के बीच के स्थान को आमा- शय कहते हैं। वातगुल्म बस्ति में भी होता है। इसलिये वातगुल्म में 'महास्रोतस्' शब्द पड़ा है। महास्रोतस् शब्द से बस्ति का भी ग्रहण होजाता है।