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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व अग्निवेश

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished639 pages

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४३४ चरकसंहिता [ अ० ३ गर्भ के गिर जाने से, या बालक प्रसव करने के पीछे अथवा ऋतुकाल में वात- प्रकोपक वस्तुओं के सेवन करने से वायु शीघ्र ही प्रकुपित हो जाता है ॥१४॥ स प्रकुपितो योनिमुखमनुप्रविश्याऽऽर्तवमुपरुणद्धि, मासि मासि तदार्तवमुपरुध्यमानं कुक्षिमभिवर्धयति । तस्याः शूल-कासातीसारच्छ- र्द्यरोचकाविपाकाङ्गमर्द-निद्रालस्य-स्तैमित्य-कफ-प्रसेकाः समुपजायन्ते । स्तनयोश्च स्तन्यमोष्ठयोः स्तनमण्डलयोश्च काष्ण्यं, ग्लानिश्चक्षुषोर्मूर्च्छा, हृल्लासो, दोहदः, श्वयथुः पादयोरीषदोद्गमो रोमराज्याः, योन्याश्चाटा- लत्वं, अपि च योन्या दौर्गन्ध्यमास्रावश्चोपजायते, केवलञ्चास्या गुल्मः पिण्डित एव स्पन्दते, तामगर्भा' गर्भिणीमित्याहुर्मूढाः ॥ १५ ॥ रक्तगुल्म की सम्प्राप्ति—यह कुपित वायु योनिमुख में प्रविष्ट होकर आर्तव को रोक देता है। प्रत्येक मास में रुक रुक कर यह आर्तव कोष्ठ को बड़ा कर देता है । इससे स्त्री को शूल, कास, अतीसार, वमन, अरुचि, अविपाक, अंगों का टूटना, निद्रा, आलस्य, कफ का (लार का) मुख से आना, स्तनों में दूध का आना * ओंठ एवं स्तनों के चूचुकों का काला हो जाना, आंखों में ग्लानि, मूर्च्छा, वमन की अभिरुचि, गर्भ के समान अनेक लक्षण, पांव में सूजन, रोमराज़ि में विस्फुरण, योनि का फैल जाना, योनि में दुर्गन्ध आना तथा योनि में से स्राव होना इत्यादि विकार उत्पन्न होजाते हैं। इस प्रकार गुल्म पेट में हिलता है, अज्ञानी लोग गर्भरहित स्त्री को भी गर्भिणी कहने लगते हैं ॥१५॥ एषां तु खलु पञ्चानां गुल्मानां प्रागभिनिवृत्तेरेमानि पूर्वरूपाणि भवन्ति । तद्यथा— अनन्नाभिलषणमरोचकाविपाकावग्निर्वैषम्यं विदाहो भुक्तस्य विपाककाले चायुक्त्या छर्द्युद्गारौ, वातमूत्रपुरीषवेगानाम- प्रादुर्भावः, प्रादुर्भूतानां चाप्रवृत्तिरीषद्रागमनं वा, वातशूलाटोपान्त्र- कूजनापरिकर्षणानिप्रवृत्तपुरीषताऽबुभुक्षा, दौर्बल्यं, सौहित्यस्य चासह- त्वमिति गुल्मपूर्वरूपाणि भवन्ति ॥ १६ ॥

  • आर्तव रोग का यह प्रभाव है कि स्तनों में दूध आजाता है। गर्भावस्था में भी आर्तव के रुकने से स्तनों में दूध आता है। गर्भवती स्त्री में जो रस बनता है, उसके तीन कार्य होते हैं। (१) माता के शरीर का पोषण, (२) स्तनों में दूध, (३) बच्चे का पोषण, इसलिये यह आर्तव भी स्तनों में दूध उत्पन्न कर देता है। १. जो स्त्रियां बच्चों के लिये बहुत लालायित रहती हैं उनमें भी ऋतु- धर्म के रुक जाने पर ये लक्षण दीखने लगते हैं। इस अवस्था में यदि सुंघाकर परीक्षा करें तो सिवाय वायु के और कुछ उपलब्ध नहीं होता