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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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९६ चरकसंहिता [ अ० ७ कफ और ओज की भी आधी २ अञ्जलि है। इस प्रकार से शरीर के तत्त्व कह दिये ॥ १७ ॥ तत्र यद्विशेषतः स्थूलं स्थिरं मूर्तिमद् गुरु-खर-कठिनमङ्गं नखास्थि- दन्तवेष्ट-मांस-चर्म-वर्चः-केश-श्मश्रु-लोम-कण्डरादि तत्पार्थिवं गन्धो घ्राणं च, यद्-द्रव-सर-मन्द स्निग्ध-मृदु-पिच्छिलं रस-रुधिर-वसा-कफ- पित्त-मूत्र स्वेदादि तदाप्यं रसो रसनं च । यत्पित्तमूष्मा यो या च भाः शरीरे, तत्सर्वमाग्नेय रूपं दर्शनं च, यदुच्छ्वास-प्रश्वासोन्मेष-निमेषा- कुञ्चन-प्रसारण-गमन-प्रेरण-धारणादि तद्वायवीयं स्पर्शः स्पर्शनं च, यद्वि- विक्तमुच्यते महान्ति चाणूनि स्रोतांसि, तदान्तरीक्षं शब्दः श्रोत्रं च । यत्प्रयोक्तृ तत्प्रधानं बुद्धिर्मनश्चेति शरीरावयवसंख्या यथास्थूलभेदेनाव- यवानां निर्दिष्टा ॥ १८ ॥ शरीर में जो अंग विशेषत स्थूल, स्थिर, कठिन, गुरु, खर, कठोर हैं, नख, अस्थि, दन्तवेष्ट मास, चर्म, वर्चस्, केश, श्मश्रु, लोम, कण्डरा आदि यह तथा गन्ध और नासिका यह सब पार्थिव अग हैं। जो भाग द्रव, सर, मन्द, स्निग्ध, मृदु, पिच्छिल, रस, रुधिर, बसा, कफ, पित्त, मूत्र, स्वेद आदि तथा रस और जिह्वा यह सब जलीय अश हैं। जो पित्त, गरमी, शरीर में जो कान्ति रूप और आख है वह अग्न के अश हैं। जो उच्छ्वास, प्रश्वास, उन्मेष निमेष, आकुञ्चन, प्रसारण, गमन, प्रेरण, धारण आदि कर्म तथा स्पर्श और त्वचा हैं, यह सब वायु के अश है। शरीर में जो छेद महान् या सूक्ष्म हैं, ये सब प्रकार के स्रोतस्; शब्द और कान हैं यह आकाश के अश हैं। जो इनका प्रयोग करता है, वह प्रधान बुद्धि और मन हैं यह शरीर के अवयवों की सख्या स्थूल दृष्टि भेद में अवयवों की सख्या कह दी गई है ॥ १८ ॥ शरीरावयवास्तु परमाणुभेदेनापरिसंख्येया भवन्त्यतिबहुत्वाद्- तिसौक्ष्म्यादतीन्द्रियत्वाच्च । तेषां सयोगविभागे परमाणूनां कारणं वायु. कर्म स्वभावश्च ॥ १९ ॥ शरीर के अवयव परमाणु भेद से असख्य हैं। क्योकि बहुत अधिक हैं, वे अति सूक्ष्म होने से वा अतीन्द्रिय होने से असख्य हैं। शरीर के इन परमा- णुओं के संयोग और विभाग में कारण वायु, कर्म और स्वभाव है ॥ १९ ॥ तदेतच्छरीरं संख्यातमनेकावयवं दृष्टमेकत्वेन सङ्गः, पृथक्त्वेनाप- वर्गः। तत्र प्रधानमसक्तं सर्वसन्ताननिवृत्तौ निवर्त्तत इति ॥ २० ॥