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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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६८ चरकसंहिता [ अ० ८ अथाप्येतौ स्त्रीपुंसौ स्नेहस्वेदाभ्यामुपपाद्य वमनविरेचनाभ्यां संशोध्य क्रमेण प्रकृतिमापादयेत्, संशुद्धौ चास्थापनानुवासनाभ्यामुप- चरेत्, उपचरेच्च मधुरौषधसंसृष्टाभ्यां घृतक्षीराभ्यां पुरुषं, स्त्रियं तु तैलमाषाभ्याम्¹ ॥ ४ ॥ उक्त गुणोंवाले पुरुष और स्त्री को वैद्य स्नेहन और स्वेदन कर्म कराके पीछे से वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध करे। पीछे पेया आदि देकर क्रमश प्रकृति में लाये। इस प्रकार शुद्ध होने पर आस्थापन और अनुवासन कर्म करावे। मधुर औषधियों से संस्कृत या जीवनीय गण की औषधियों से घृत, दूध से पुरुष का, तथा तैल और माप ( उड़द की दाल ) से स्त्री को पुष्ट करे। [ पुरुष को सौम्य औषधियों से संस्कृत अन्न दे, क्योंकि पुरुष की प्रकृति सौम्य है, इसलिये शुक्र की वृद्धि होगी। स्त्री की प्रकृति उष्ण है, इसलिये उसको उष्ण पदार्थो से संस्कृत अन्न दे ] ॥ ४ ॥ रजस्वला के कर्त्तव्य— ततः पुष्पादप्रभृति त्रिरात्रमासीत ब्रह्मचारिण्यधःशायिनी पाणि- भ्यामन्नमजर्जरपात्रे² भुञ्जाना न च काञ्चिन्मृजामापद्येत, ततश्चतुर्थेऽ- हन्येनामुन्मद्य सशिरस्कं स्नापयित्वा शुक्लानि वासांस्याच्छादयेत्पुरुषं च ततः शुक्लवाससौ स्रग्विणौ सुमनसावन्योन्यमभिकामौ संवसेता- मिति ब्रूयात् ॥ ५ ॥ पुष्प दर्शन ( रजोदर्शन ) होने पर तीन रात तक स्त्री ( रजोधर्म के दिनों में ) ब्रह्मचर्य्य-व्रत का पालन करे ! जमीन पर सोये, न फूटे हुए बर्तनो में हाथों से भोजन करे, [ चम्मच आदि से भोजन न करे ] किसी भी प्रकार का शरीर पर भूषण या सजावट, स्नान-लेपन आदि नहीं करे। चौथे दिन ऋतु समाप्त होने पर भली प्रकार स्नान करे, शिर को भी साफ करे, श्वेत वस्त्र पहिने। पुरुष भी स्नान करके श्वेत वस्त्र ही पहिने। इसके अनन्तर स्त्री और पुरुष दोनों श्वेत वस्त्रों को पहिने हुए, मालाओं को धारण किये हुए, प्रसन्न मन, परस्पर की कामना करते हुए मथुन करे, वैद्य ऐसा उपदेश दे ॥ ५ ॥ स्नान के उपरान्त कर्त्तव्य— स्नानात्प्रभृति युग्मेष्वहःसु संवसेतां पुत्रकामौ, अयुग्मेषु दुहितृ- कामौ ॥ ६ ॥ १. 'तैलमाषाभ्याम्' इति क्वचित् पाठः । २ 'अजर्जरात् पात्राद्' इति च पाठः ।

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