चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context१३४ चरकसंहिता [ अ० ८ बच्चों का प्राणहरण करने वाले न हों तथा बच्चों को भय देने वाले न हों ऐसे होने चाहिये ॥ ६५ ॥ न ह्यस्य वित्रासनं साधु तस्मात्तस्मिन् रुदत्यभुञ्जाने वाऽन्यत्र वाऽ- विधेयतां गच्छति राक्षस-पिशाच-पूतनाद्याना नामानि चाऽऽह्वयता कुमारस्य वित्रासनार्थं नामग्रहणं न कार्यं स्यात् ॥ ६६ ॥ शिशु को भय देना—शिशु को डराना, भय दिखाना अच्छा नहीं, रोते हुए भोजन न करने पर अथवा अन्य इसी प्रकार की अवस्था में जब बालक काबू में न आवे तो शिशु को डराने के लिये राक्षस, पिशाच, पूतना आदि का नाम नहीं लेना चाहिये ॥ ६६ ॥ यदि त्वातुर्यं किंचित्कुमारमागच्छेत्तत्प्रकृति-निमित्त-पूर्वरूप-लिङ्गो- पशय-विशेषैस्तत्त्वतोऽनुबुध्य सर्वविशेषानातुरौषध-देश-क-लाश्रयानवे- क्षमाणश्चिकित्सितुमारभेतेनं मधुर-मृदु-लघु-सुरभि-शीत-शङ्करं कर्म प्रवर्तयन्, एवं सात्म्या हि कुमारा भवन्ति, तथा ते शर्म लभन्तेऽचि- राय । अरोगेष्वरोगवृत्तमातिष्ठेत् ॥ ६७ ॥ यदि कभी शिशु रोगी हो जाये तो वात आदि प्रकृति, कारण, पूर्वरूप, लक्षण, उपशय आदि से रोग का वास्तविक रूप जान कर रोगी सम्बन्धी सब बातों की देश, काल और शरीर का देखकर चिकित्सा आरम्भ करे। चिकित्सा मे मधुर, मृदु, लघु, सुगन्धित, शीतल, कल्याणकारी कर्म (औषध) करना चाहिये। कुमार भी इसी सात्म्य के (मधुर, मृदु, शीतल, लघु) होते हैं, ऐसी ही औषध उनको लाभदायक है। इस प्रकार से बालक शीघ्र ही सुखी, नीरोग हो जाते हैं। स्वस्थ अवस्था में स्वस्थ वृत्त का पालन करना चाहिये ॥६७॥ देश-कालात्म-गुण-विपर्ययेण वर्तमानः क्रमेणासात्म्यानि परिवर्त्यो- पयुञ्जानः सर्वाण्यहितानि वर्जयेत् । तथा बलवर्णशरीरायुषां संपद- मवाप्नोतीति ॥ ६८ ॥ देश, काल और आत्मा इनके गुणों के विपरीत अवस्था मे कुमार को असात्म्य देश, काल से क्रमश सात्म्य देश, काल, आत्म-गुणों पर बदलना चाहिये। सब प्रकार के अहित वस्तुओं का त्याग करना चाहिये। इस प्रकार से उत्तम बल, वर्ण शरीर और उत्तम आयु प्राप्त होती है ॥ ६८ ॥ एवमेनं कुमारमायौवनप्राप्तेर्धर्मार्थकौशलागमनाच्चानुपालयेत् ।