चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context१४२ चरकसंहिता [ अ० २
जिस रोगी के दोनों ओठ नीले रंग के अथवा पके जामुन के समान हो जाये, उसको मरने वाला समझना चाहिये, उसकी आयु समाप्त हो गई है ॥२४॥ एको वा यदि वाऽनेको यस्य वैकारिकः स्वरः । सहसोत्पद्यते जन्तोर्हीयमानस्य नास्ति सः ॥ २५ ॥ जिस रोगी में वैकारिक स्वर एक या अनेक प्रकार के स्वर उत्पन्न हो जाते हैं, वह क्षीण होता हुआ रोगी जीवित नहीं रहता ॥ २५ ॥ यच्चान्यदपि किञ्चित्स्याद्वैकृतं स्वरवर्णयोः । बलमांसविहीनस्य तत्सर्वं मरणोदयम् ॥ २६ ॥ बल, मांस से विहीन रोगी में इनके अतिरिक्त स्वर और वर्ण में कुछ वैका- रिक भाव आ जाये तो यह सब मृत्यु के सूचक हैं ॥ २६ ॥ तत्र श्लोकः—इति वर्णस्वरावुक्तौ लक्षणार्थं मुमूर्षताम् । यस्तु सम्यग्विजानाति नाऽऽयुर्ज्ञाने स मुह्यति ॥ २७ ॥ जो वैद्य मरणोन्मुख पुरुषों के वर्ण स्वर के इन लक्षणों को भली प्रकार जानता है, वह आयु के परिज्ञान में कभी धोखा नहीं खाता ॥ २७ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते इन्द्रियस्थाने वर्णस्वरीयमिन्द्रिय नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
द्वितीयोऽध्यायः अथातः पुष्पितमिन्द्रियं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे ‘पुष्पितक इन्द्रिय’ नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे जैसा भगवान् आत्रेय ने कहा था ॥ १-२ ॥ पुष्पं यथा पूर्वरूपं फलस्येह भविष्यतः । तथा लिङ्गमरिष्टाख्यं पूर्वरूपं मरिष्यतः ॥ ३ ॥ अप्येवं तु भवेत्पुष्पं फलेनाननुबन्धि यत् । फलं चापि भवेत्किञ्चिद्यस्य पुष्पं न पूर्वजम् ॥ ४ ॥ न त्वरिष्टस्य जातस्य नाशोऽस्ति मरणादृते । मरणं चापि तन्नास्ति यन्नारिष्टपुरःसरम् ॥ ५ ॥ जिस प्रकार भविष्य में होने वाले फल का पूर्वरूप ‘पुष्प’ होता है, उसी प्रकार मरणोन्मुख पुरुष के लक्षण ‘अरिष्ट’ नाम से होते हैं ।