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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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१४८ चरकसंहिता [ अ० ३ दृष्टि, अशुद्ध देखने वाली (विपरीत देखने वाली), हीनदृष्टि (जो दूर से न देख सके), नकुलान्ध कपोतान्ध अलातवर्ण, अगारे के समान आख लाल ही दीखे वा काला, पीला, नीला, श्याम, ताम्बे के समान, हरा, श्वेत इन वैकारिक वर्णों में से किसी एक वर्ण से आक्रान्त हो तो रोगी को मरा हुआ जानना चाहिये। अथास्य केशलोमान्यायच्छेत्—तस्य चेत्केशलोमान्यायस्यमानानि प्रलच्चेरन्न च वेद्येयुः परासुरिति विद्यात् । शिर के बाल या शरीर के बाल खींचने पर उखड़ आयें और रोगी को इनके उखड़ने का पता न लगे (दर्द न हो) तो उसको मरा हुआ जानना चाहिये। तस्य चेदुदरे सिराः प्रदृश्येरन् श्याव-ताम्र-नील-हारिद्र-शुक्ला वा स्युः परासुरिति विद्यात् । यदि रोगी के पेट की शिरायें दीखने लगे अथवा इनका रंग काला, ताम्बे का रंग, हल्दी के समान पीला या श्वेत हो जाये तो उसे मरा हुआ ही जाने । तस्य चेन्नखा वीतमांसशोणिताः पक्वजाम्बववर्णाः स्युः, परासु- रिति विद्यात् । जिस रोगी के नखों का मास और रक्त क्षीण हो जाये, पकी हुई जामुन के समान नख काले नीले हो जायें तो उसे मरा हुआ समझें । अथास्याङ्गुलीरायच्छेत्तस्य चेदङ्गुलय आयम्यमाना न चेत्स्फुटेयुः, परासुरिति विद्यात् ॥ ८ ॥ रोगी पुरुष की अंगुलियो को पकड़कर खींचे और यदि उसकी अगुलियों में चटकने की आवाज़ न आये, तो उसे गतायु (मृत) ही समझे ॥ ८ ॥ भवति चात्र—एतान् स्पृश्यान् बहून् भावान् यः स्पृशन्नावबुध्यते । आतुरे न स संमोहमायुर्ज्ञानस्य गच्छति ॥ ६ ॥ वर्णन किये हुए स्पृश्य अंगों को स्पर्श करके सम्पूर्ण लक्षणों को जो वैद्य भली प्रकार से जान लेता है, वह रुग्ण पुरुष के आयुर्ज्ञान मे कभी धोखा नही खाता ॥ ६ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते इन्द्रियस्थाने परिमर्द्दनीयेन्द्रिय नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥