चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context१५४ चरकसंहिता [ अ० ५ ( ३ ) जो रोगी नींद में प्रेतों के साथ मद्य पान करे और स्वप्न मे जिसको कुत्ते घसीटते हो वह रोगी पुरुष घोर ज्वरी होकर जीता नहीं बच सकता ॥६॥ लाक्षारक्ताम्बराभं य पश्यत्यम्बरमन्तिकात् । स रक्तपित्तमासाद्य तेनैवान्ताय नीयते ॥ १० ॥ रक्तस्रग् रक्तसर्वाङ्गो रक्तवासा मुहुर्हसन् । यः स्वप्ने ह्रियते नार्या स रक्तं प्राप्य सीदति ॥ ११ ॥ ( ४ ) जो रोगी समीप मे ही आकाश को लाख के रस या मेंहदी के रंग में रंगे कपड़े के समान लाल देखे, वह रक्तपित्त रोग में ग्रस्त होकर उसी रोग से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है । ( ५ ) जो रोगी स्वप्न में लाल माला पहिने, सब अगों को लाल देखे, लाल कपड़ा पहिने, बार बार हसता हुआ, स्त्री से कहीं अन्यत्र ले जाया जाये, वह पुरुष रक्त पित्त का रोगी हो कर मर जाता है ॥ १०-११ ॥ शूलाटोपान्त्रकूजञ्च दौर्बल्य चातिमात्रया । नखादिषु च वैवर्ण्य गुल्मेनान्तकरो ग्रहः ॥ १२ ॥ लता कण्टकिनी यस्य दारुणा हृदि जायते । स्वप्ने गुल्मस्तमन्ताय क्रूरो विशति मानवम् ॥ १३ ॥ ( ६ ) जिस रोगी को शूल, आध्मान ( आफरा ), आतों का कूजना शब्द, और बहुत अधिक दुर्बलता हो, तथा नख आदि जिसके श्वेत हो जाये उस रोगी का गुल्म ही मृत्युकारी होता है । ( ७ ) जिस रोगी के हृदय मे स्वप्न में काटेदार बेल उत्पन्न हो, उस रोगी को गुल्म रोग मृत्युरूप से आता है ॥ १२-१३ ॥ कायेऽल्पमपि सस्पृष्टं सुभृश यस्य दीर्यते । क्षतानि च न रोहन्ति कुष्ठैर्मृत्युर्हिनस्ति तम् ॥ १४ ॥ नग्नस्याज्यावसिक्तस्य जुह्वतोऽग्निमनर्चिषम् । पद्मान्युरसि जायन्ते स्वप्ने कुष्ठैर्मरिष्यतः ॥ १५ ॥ ( ८ ) जिस रोगी के शरीर पर थोड़ा सा स्पर्श किया हुआ बहुत अधिक घाव कर देता है, तथा जिसके व्रण नहीं भरते, वह मनुष्य कुष्ठ रोग के कारण मरता है । ( ६ ) जो मनुष्य स्वप्न में नगा होकर, अंगों पर घी लगा कर बिना ज्वाला के अग्नि में हवन करता वा जिसके हृदय में से कमल उत्पन्न होता है, वह कुष्ठ रोग से मरता है ॥ १४-१५ ॥