BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 184 of 616

Read in context
Page 184

१७० चरकसंहिता [ अ० ८

मुखं शब्दश्रवावोष्ठौ शुक्लश्यावातिलोहितौ ।
विकृतौ यस्य वा नीलौ न स रोगाद्विमुच्यते ॥ १२ ॥
( १० ) जिस रोगी का मुख, दोनों कान और दोनों ओठ (विकार के
कारण) श्वेत, काले, लाल, वा नीले हो जाते हैं, वह रोग से मुक्त नहीं होता,
वह मर जाता है ॥ १२ ॥
अस्थिश्वता द्विजा यस्य पुष्पिताः पङ्कसंवृताः ।
विकृत्या न स रोगं तं विहायाऽऽरोग्यमश्नुते ॥ १३ ॥
( ११ ) जिस रोगी के दांत विकार से अस्थि के समान श्वेत, पुष्पित
अथवा कीचड़ या मैल से ढक जाते हैं, वह रोगी रोग से छूट कर कभी आरोग्य
लाभ नहीं करता ॥ १३ ॥
स्तब्धा निश्चेतना गुर्वी कण्टकापचिता भृशम् ।
श्यावा शुष्काऽथवा शूना प्रेतजिह्वा बिसर्पिणी ॥ १४ ॥
( १२ ) जिस रोगी की जीभ स्तब्ध, —जड़, कड़ी, चेतना रहित, भारी
और बहुत से कांटों से भर जाये, काली, लाल, सूखी या सूजी हुई अथवा
बाहर को निकल २ आवे, यह जिह्वा मृतपुरुष का लक्षण है ॥ १४ ॥
दीर्घमुच्छ्वस्य यो ह्रस्वं नरो निःश्वस्य ताम्यति ।
उपरुद्धायुषं ज्ञात्वा तं धीरः परिवर्जयेत् ॥ १५ ॥
( १३ ) जोर से बाहर सांस फेंक कर जो रोगी अन्दर छोटा (थोड़ा वायु)
सांस लेता है, और सांस लेते समय कष्ट अनुभव करता या मूर्च्छित हो जाता है,
उस रोगी की आयु मरणासन्न समझकर उसे त्यागना चाहिये ॥ १५ ॥
हस्तौ पादौ च मन्ये च तालु चैवातिशीतलम् ।
भवत्यायुःक्षये क्रूरमथवाऽतिभवेन्मृदु ॥ १६ ॥
( १४ ) जीवन के नाश के समय हाथ, पाव, गले की नसे, तालु बहुत
ठण्डे या बहुत कठोर अथवा बहुत कोमल हो जाते हैं ॥ १६ ॥
घट्यञ्जानुना जानु पादावुद्यम्य पातयन् ।
योऽपास्यति मुहुर्वक्त्रमातुरो न स जीवति ॥ १७ ॥
( १५ ) जो रोगी घुटनों से घुटनों को रगड़ता है, पाव को ऊपर उठाकर
जमीन पर पटकता है, बार-बार मुख को इधर-उधर चलाता है वह रोगी
नहीं बचता ॥ १७ ॥
दन्तैश्छिन्दन्नखाग्राणि नखैश्छिन्दञ्छिरोरुहान् ।
काष्ठेन भूमिं बिलिखन्न रोगात्परिमुच्यते ॥ १८ ॥