BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 19 of 616

Read in context
Page 19

४ चरकसंहिता [ अ० १ लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव वा । सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां संनिकर्षे न वर्तते ॥ १८ ॥ १वैवृत्त्यान्मनसो ज्ञानं, सान्निध्यात्तच्च वर्तते । अणुत्वमथ चैकत्वं द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ ॥ १९ ॥ चिन्त्यं विचार्यमूह्यं च ध्येयं संकल्प्यमेव च । यत्किंचिन्मनसो ज्ञेयं तत्सर्वं ह्यर्थसञ्ज्ञकम् ॥ २० ॥ इन्द्रियाभिग्रहः कर्म मनसः स्वस्य निग्रहः । ऊहो विचारश्च, ततः परं बुद्धि प्रवर्तते ॥ २१ ॥ इन्द्रियेणेन्द्रियार्थो हि समनस्केन गृह्यते । कल्प्यते मनसाऽप्यूर्ध्वं गुणतो दोषतो यथा ॥ २२ ॥ जायते विषये तत्र या बुद्धिर्निश्चयात्मिका । व्यवस्यति यया वक्तुं कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ॥ २३ ॥ मन का लक्षण—ज्ञान का न होना और होना मन का लक्षण है, क्योंकि आत्मा और इन्द्रिय का विषय के साथ सन्निकर्ष होने पर भी मन का योग न होने से ज्ञान नहीं होता। मन का योग होने पर ही ज्ञान होता है। २ मन के दो गुण हैं (१) अणुत्व और (२) एकत्व । मन के विषय—चिन्त्य (नाना प्रकार के विषयों को सोचना, गुण या दोष से विचारना), तर्क (एकाग्र मन से सोचना), सकल्प, (कर्त्तव्य अकर्त्तव्य का निश्चय) इनके अतिरिक्त और भी जो सुख दुःख आदि मन से ग्राह्य हैं, वे सब मन के विषय कहे जाते हैं। मन के कर्म--इन्द्रियों का नियमन उनको अपने विषय मे प्रवृत्त करना, इस मन को अहित वस्तुओं से रोकना, शास्त्र में कही बात पर युक्ति से विचार करना, विचार, ध्यान, सकल्प आदि ये सब मन के कार्य हैं, इसके आगे बुद्धि प्रवृत्त होती है। बुद्धि की उत्पत्ति—प्रथम मन से युक्त कान आदि इन्द्रिया, इन्द्रिय के विषयों का ग्रहण करती हैं। वे वस्तुमात्र को ही ग्रहण करती हैं। मन इन्द्रिय से गृहीत विषय का गुण या दोष रूप से विचार करता है। इन्द्रिय से ग्रहण १ वैवृत्यात्—या २ मन का लक्षण--'अयोगपद्यात् ज्ञानानां तस्याणुत्वमिहेष्यते' । विश्वनाथकारिका । 'ज्ञानयौगपद्यादेकं मन' ॥ न्याय० २ । ४ । ६० ॥