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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० ११] इन्द्रियस्थानम् १७९ विकृत्या विनिमित्तं यः शोभामुपचयं धनम् । प्राप्नोत्यतो वा विभ्रंशं समान्तं न स जीवति ॥ ६ ॥ वर्षान्त अरिष्ट— ( १ ) अणुज्योति अर्थात् मन्द जाठराग्नि वाला व्याकुल चित्त, अशुभ छाया वाला, निर्बल दुःखी मनवाला, जा किसी भी प्रकार से सुख अनुभव नहीं करता, ऐसा पुरुष एक वर्ष के अन्दर २ मर जाता है । ( २ ) जिस रोगी की दी हुई बलि (अन्न) को कौवे आदि पक्षी नहीं खाते, वह एक साल के अन्दर परलोक मे पिण्ड (कर्मफल) का भोग करता है । ( ३ ) जो सप्तर्षियों के पास स्थित अरुन्धती नाम नक्षत्र को नहीं देखता, वह एक साल के अन्दर महा-अन्धकार (मृत्यु) को देखता है । ( ४ ) जो मनुष्य बिना किसी कारण शोभा (शरीर की पुष्टि, अथवा धन सञ्चय को या इनके सहसा विनाश को पाता है वह एक साल पर्यन्त भी नहीं जीता ॥ ३-६ ॥ भक्तिः शीलं स्मृतिस्त्यागो बुद्धिर्बलमहेतुकम् । षडेतानि निवर्तन्ते षड्भिर्मासैर्मरिष्यतः ॥ ७ ॥ धमनीनामपूर्वाणां जालमत्यर्थशोभनम् । ललाटे दृश्यते यस्य षण्मासान्न स जीवति ॥ ८ ॥ लेखाभिश्चन्द्रवक्राभिर्ललाटमुपचीयते । यस्य तस्यायुषः षड्भिर्मासैरन्तं समादिशेत् ॥ ९ ॥ ( ५ ) षण्मासान्त अरिष्ट—छः मास में मरने वाले मनुष्य के छः गुण भक्ति-इच्छा, शील स्वभाव, स्मृति, त्याग, बुद्धि और बल बिना कारण के ही नष्ट हो जाते हैं । ( ६ ) जिस रोगी के माथे पर नाड़ियों का सुन्दर जाल दीखने लगे (जो पहिले न हों), वह छः मास के पीछे नहीं जीता । ( ७ ) जिसके माथे पर द्वितीया या तृतीया के चन्द्रमा के समान टेढी रेखाये दीखने लगें, उसकी आयु छः मास में समाप्त हुई बतला दे ॥ ७-९ ॥ शरीरकम्पः संमोहो गतिर्वचनमेव च । मत्तस्येवोपलक्ष्यन्ते यस्य मासं न जीवति ॥ १० ॥ रेतोमूत्रपुरीषाणि यस्य मज्जन्ति चाम्भसि । स मारुताशनद्वेष्टा मृत्युद्वारिणि मज्जति ॥ ११ ॥ हस्तपादं मुखं चोभौ विशेषाद्यस्य शुष्यतः । शूयेते वा विना देहात्स च मासं न जीवति ॥ १२ ॥ ( ८ ) मासान्त अरिष्ट—जिसके शरीर में कम्पन, मूर्छा और चाल और वाणी शराबी की भाति हो जाती हैं, वह मास भर भी नहीं जीता । ( ९ ) जिस-