BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 218 of 616

Read in context
Page 218

२०४ चरकसंहिता [ अ० १ दिनों तक ब्रह्म, तप, एवं ब्रह्मचर्य का अत्यन्त एकाग्रता (निष्ठा) के साथ पालन कर सके । दीर्घायु को चाहनेवाले व्यक्ति को चाहिये कि इस रसायन का उपयोग करे । इसके सेवन से दीर्घायु, श्रेष्ठ वय, मनचाही कामनायें प्राप्त होती हैं ॥ ५३-५६ ॥ यथोक्तगुणानामामलकाना सहस्रं पिष्ट-स्वेदन-विधिना पयस ऊष्मणा सुस्विन्नमनातपशुष्कमनस्थि चूर्णयेत्, तदामलकसहस्रं स्वरसपरिपोतँ स्थिरा-पुनर्नवा-जीवन्ती- नागबला ब्रह्मसुवर्चला-मण्डूकपर्णी-शतावरी- शङ्खपुष्पी-पिप्पली-वचा-विडङ्ग स्वयंगुप्तामृता-चन्दनागुरु-मधुक-मधूक- पुष्पोत्पल-पद्म-मालती-युवती यूथिका-चूर्णाष्टभाग-संयुक्तं, पुनर्नार्गबला- सहस्रपल-स्वरस-परिपोतमनातपशुष्कं द्विगुणितमषिषा क्षौद्रसर्पिषा वा क्षुद्रगुडाकृति कृत्वा शुचौ दृढे घृतभाविते कुम्भे भस्मराशेरधः स्थापयेदन्त- र्भूमेः पक्षं कृतरक्षाविधानमथर्ववेदविदा, पक्षात्यये चोद्धृत्य कनक रजत- ताम्र-प्रवाल-कालायस-चूर्णाष्टभाग-सयुक्तमर्धकर्षवृद्ध्या यथोक्तेन विधिना प्रातः प्रातः प्रयुञ्जानोऽग्निबलमभिसमीक्ष्य जीर्णे च षष्टिकं पयसा ससर्पिष्कमुपसेवमानो यथोक्तान् गुणान् समश्नुत इति ॥ ५७ ॥ ब्राह्म रसायन—ऊपर कहे हुए गुणों से युक्त एक हजार आवलों को पिष्ट- स्वेदन विधि द्वारा दूध की गरमी से स्विन्न करना चाहिये* । जब भली प्रकार से स्विन्न हो जायें तब इनकी गुठली निकाल कर इनको छाया में शुष्ककर लेना चाहिये । शुष्क होने पर इनके चूर्ण को एक एक हजार आवलों

  • पिष्ट-स्वेदन विधि कई प्रकार की है । जेमे— (१) एक मलमल में आवले बाधकर हाड़ी के मुख मे लटका देना चाहिये। हाडी मे दूध भर देना चाहिये । दूध आवलों को छुए नहीं । इसको कोमल आग पर गरम करना चाहिये । जब आवले नरम हो जाये तब बाहर कर ले । (२) हाडी मे दूध भर कर हाडी के मुख पर जाली या मलमल बाधकर उस पर आवले रख दें। ऊपर से दूसरी हाडी ढाप दे। फिर गरम करें। (३) हाडी में दूध भर कर ऊपर मुख पर घास आदि रखकर उस पर आंवले रख कर गरम करें । (२) क्षुद्र गुड़ाकृति का अर्थ चक्रपाणि ने फाणित, राब किया है। राब के समान होने पर— (३) अष्टाग सग्रह में—'द्विगुण-सर्पिषा क्षौद्रेण' यह पाठ है। अर्थात् शहद से घी दुगुना लेना चाहिये। यह ठीक भी है।