चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextपा० १ ] १४ चिकित्सितस्थानम् २०६ युक्तेन विदारीस्वरसेन क्षीराष्टगुणसंप्रयुक्तेन च सर्पिषः कुम्भं साध- यित्वा प्रयुञ्जानोऽग्निबलसमा मात्रां, जीर्णे च क्षीरसर्षिभ्यां शालि- षष्टिकमुष्णोदकानुपानमश्नन्, जरा-व्याधि-पापाभिचार-व्यपगत-भयः, शरीरेन्द्रिय-बुद्धि-बलमतुलमुपलभ्याप्रतिहतसर्वारम्भः परमायुरवाप्नुया- दिति ॥ ७५ ॥ इति पञ्चमो हरीतकीयोगः१ । हरितक्यादि योग—हरड़, बहेड़ा, आवला, पाचों पंचमूल इनके सम्मिलित क्वाथ में, पिप्पली, मुलहठी, महुआ, काकोली, क्षीरकाकोली, कौंच बीज, जीवक, ऋषभक, क्षीरशुक्ला (क्षीरविदारी या निशोथ) इनके कल्क से, विदारी के स्वरस से, आठ गुण दूध मिलाकर दो गुणा गोघृत सिद्ध करे * । जाठराग्नि के बल के अनुसार इसका उपयोग करे । जीर्ण होने पर दूध और घी के साथ शालि (हेमन्त धान) या साठी का भात खाना चाहिये । अनुपान गरम जल होना चाहिये । इसके प्रयोग से बुढ़ापा पाप और रोग तथा अभिचार का भय नहीं रहता । इसके सेवन से देह, इन्द्रिय और बुद्धि का अतुल बल हो जाता है । सब कार्य बिना बाधा के पूर्ण होते हैं तथा पूर्ण आयु प्राप्त होती है ॥ ७५ ॥ हरीतक्यामलक-बिभीतक-हरिद्रा-स्थिरा-वचा [ बला ] विडङ्गामृत- वल्ली-विश्वभेषज मधुक-पिप्पली-सोमवल्क-सिद्धेन क्षीरसर्षिषा मधु- शर्कराभ्यामपि च संन्नीयमलक-स्वरस-शत-पल-परिपीतमामलकचूर्ण- मयश्चूर्णचतुर्भागसंप्रयुक्त पाणितलमात्रं प्रातः प्रातः प्राश्य यथोक्तेन विधिना साय मुद्गयूषेण पयसा वा ससर्पिष्क शालिषष्टिकमश्रीयात् । त्रिवर्षप्रयोगादस्य वर्षशतमजरं वयस्तिष्ठात, श्रुतमवतिष्ठत, सर्वामयाः प्रशाम्यन्ति, विषमविषीभवति गात्रे, मात्रमश्मवत् स्थिराभवति, अदृ [ धृ ] श्यो (ष्यो) भूतानां भवतीति ॥ ७६ ॥ इति षष्ठो हरीतकीयोग । १. इतिपञ्चमामलकरसायनम् । *पाक विधि—चक्रपाणि के अनुसार हरीतकी आदि का क्वाथ एक भाग, विदारी स्वरस एक भाग, दूध आठ भाग, घी एक भाग । अष्टागसग्रह के अनु- सार—घी ४ द्रोण, क्वाथ ८ द्रोण, स्वरस ८ द्रोण, दूध ३२ द्रोण । परिभाषा नियम से—घी ४ द्रोण, क्वाथ १६ द्रोण, स्वरस १६ द्राण, दूध ३२ द्रोण लेना चाहिये । यथा— जलस्नेहौषधानाञ्च प्रमाणं यत्र नेरितम् । तत्र स्यादौषधः स्नेहः स्नेहात्तोय चतुर्गुणम् ॥