BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 227 of 616

Read in context
Page 227

पा० २ ] चिकित्सास्थानम् २१३ दुःखित रहता है, निरन्तर निद्रा, तन्द्रा, आलस्ययुक्त रहता है, शीघ्र ही उत्साह- हीन होकर हापने लगता है, शारीरिक और मानसिक चेष्टाओं में असमर्थ हो जाता है, स्मृति, बुद्धि और छाया (कान्ति) नष्ट हो जाती है, रोगों का घर बन जाता है और सम्पूर्ण आयु को भी नहीं भोग पाता । इसलिये इन उपरोक्त दोषों को देखते हुए पूर्व कथित अहित आहारविहार का त्याग करके ही मनुष्य रसायन का उपयोग करने के योग्य होता है। यह कहकर भगवान् पुनर्वसु आत्रेय बोले-अच्छी भूमि मे समय पर उत्पन्न हुए एव जिन के गन्ध, वर्ण और रस नष्ट नहीं हुए हों और जिनका रस वीर्य और प्रभाव भरपूर हो ऐसे आवंलों के स्वरस से, पुनर्नवा (सारोड़ी) के कल्क द्वारा घी का एक आढक (२॥ सेर) सिद्ध करे ॐ । इसी प्रकार विदारीकन्द के स्वरस और जीवन्ती कल्क के द्वारा घी का एक आढक सिद्ध करे। इसी प्रकार चौगुने दूध और बला-अतिबला के कषाय स तथा शतावरी कल्क से घृत सिद्ध करे । इस प्रकार से एक एक घी का शत पाक (सौ बार) या हजार बार पाक करे । इस प्रगर से सावित घृत मे चतुर्थांश शर्करा और मधु मिला कर घी से भावित, पवित्र एव दृढ बने स्वर्ण या चांदी अथवा मिट्टी के बर्तन मे इस घी को रख देना चाहिये । फिर कुटी प्रावेशिक पूर्वोक्त विधि से अपनी पाचनशक्ति के अनुसार प्रातःकाल प्रतिदिन खाना चाहिये। औषध के जीर्ण होने पर घी और दूध के साथ शालि (सांठी के चावलों) का भात खाना चाहिये। इस प्रयोग को तीन साल तक सेवन करने पर सौ वर्ष तक बिना वृद्धावस्था के आयु बनी रहती है। पढा सुना सब याद रहता है, सब रोग नष्ट हो जाते हैं, बेरोक- टोक के ससार में विचरता है, स्त्रियों मे अपत्यशाली होता है, उसके बहुत सन्तान होतो हैं । [ सौ बार की अपेक्षा हजार बार किया पाक अधिक गुणशाली है। एक एक घृत का पृथक् २ पाक करना चाहिये । रजत के पात्र की अपेक्षा स्वर्ण मे, मिट्टी के बर्तन की अपेक्षा रजत में अधिक गुण है।]॥ ३४॥ भवतश्चात्र । बृहच्छरीरं गिरिमारसारे स्थिरेन्द्रिय चातिबलेन्द्रियं च । अधृष्यमन्यैरतिकान्तरूपं प्रशान्तपूजासुखचित्तभाक्च ॥ ५ ॥ ॐ परिभाषांनुसार स्वरस दुगुना होगा । घी से चार गुणा स्वरस और कल्क घी का चौथाई होगा। अर्थात् यदि घृत १ आढक हो तो स्वरस ८ आढक और कल्क चौथाई आढक होगा। १ आढक = ६४ पल = ६ सेर ३२ तोले के ।