चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
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२३२ चरकसंहिता [ अ० १
मधुरश्च सतिक्तश्च जपापुष्पनिभश्च यः ।
कटुर्विपाके शीतश्च स सुवर्णस्य निस्स्रवः ॥ ५७ ॥
रूप्यस्य कटुकः श्वेतः शीतः स्वादु विपच्यते ।
ताम्रस्य बर्हिकण्ठाभस्तिक्तोष्णः पच्यते कटु ॥ ५८ ॥
यस्तु गुग्गुलुकाभासस्तिक्तको लवणान्वितः ।
कटुर्विपाके शीतश्च सर्वश्रेष्ठः स चायसः ॥ ५९ ॥
गोमूत्रगन्धयः सर्वे सर्वकर्मसु यौगिकाः ।
रसायनप्रयोगेषु पश्चिमस्तु विशिष्यते ॥ ६० ॥
इनमें से स्वर्ण-शिलाजीत—तिक्तरसयुक्त मधुर, जपा ( जासुदी ) फूल के
समान लाल, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है ।
रौप्य ( चांदी की शिला से निकला ) शिलाजीत—कटु रस, रंग में श्वेत,
शीतवीर्य, विपाक में मधुर होता है ।
ताम्र ( ताँबे से निःसृत ) शिलाजीत—मोर की ग्रीवा के समान नीली
झाँई लिये, तिक्त रस, उष्णवीर्य और विपाक में कटु होता है ।
आयस ( लोह से निस्सृत ) शिलाजीत—गुग्गुल के समान काला, भूरा,
तिक्त रस, लवण अनुरस, विपाक में कटु, शीतवीर्य होता है । यह शिलाजतु
सब में श्रेष्ठ है ।
[ कहीं कहीं पर छः प्रकार के शिलाजतुओं का वर्णन है । वहाँ पर त्रपु
और सीसक भी गिना है । ]
इन सब शिलाजतु में गोमूत्र की गन्ध आती है, ये सब कार्यों में प्रयुक्त होते
हैं । परन्तु रसायन कार्य में अन्तिम, आयस शिलाजीत ही अधिक श्रेष्ठ है ॥५७-६०॥
यथाक्रमं वातपित्ते श्लेष्मपित्ते कफे त्रिषु ।
विशेषतः प्रशस्यन्ते मला हेमादिधातुजाः ॥ ६१ ॥
खास कर वात पित्त रोग में स्वर्ण शिलाजतु का, कफ-पित्त में रजत शिला-
जतु का, कफ में ताम्र शिलाजतु का और वात-पित्त-कफ में आयस शिलाजतु
का प्रयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥
शिलाजतुप्रयोगेषु विदाहीनि गुरूणि च ।
वर्जयेत्सर्वकालं तु कुलत्थान् १ परिवर्जयेत् ॥ ६२ ॥
ते ह्यत्यन्तविरुद्धत्वादश्मनो भेदनाः परम् ।
लोके दृष्टास्ततस्तेषां प्रयोगः प्रतिषिध्यते ॥ ६३ ॥
१ 'कुनत्थान्' इति च पाठः ।