चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context३०० चरकसंहिता [ अ० ३ कोष्ठे विबद्धे सरुजि पिबेत्पेयां शृता ज्वरी । मृद्वीकापिप्पलीमूलचव्यामलकनागरैः ॥ १८६ ॥ पिबेत्सविल्वां पेया वा ज्वरे सपरिकर्तिके । बलावृक्षाम्लकोलाम्लकल्शीधावनीशृताम् ॥ १८७ ॥ अस्वेदनिद्रस्तृष्णार्तः पिबेत्पेयां सशर्कराम् । नागरामलकैः सिद्धां घृतभृष्टां ज्वरापहाम् ॥ १८८ ॥ जिन द्रव्यों का यह क्रम है, उनको अब सुनो—(१) ज्वर के रोगी के ज्वर को नाश करने के लिये यवागू, ओदन, लाज, प्रयोग करने के लिये पुराने लाल चावल और पुराने साँठी के चावलों का व्यवहार करना चाहिये । (२) जिस ज्वर-रोगी की अग्नि मन्द हो जाये उसको चाहिये कि भूख लगने पर प्रथम ज्वरनाशक, सुख से पचने वाली, पिप्पली और सोंठ से साधित लाजाओं की पेया पीये । जिस रोगी को खट्टे रस की चाह हो, उसको चाहिये कि माठ से साधित लाजा की पेया मे अनार का रस (अनारदाना) मिलाकर पीये । जिस रोगी को मल पतला आता हो अथवा पैत्तिक प्रकृति हो उसको चाहिये कि लाजा की पेया को ठण्डा करके शहद मिलाकर पीये । (३) पार्श्व (पसलियों), बस्ति (मूत्राशय) और शिर मे वेदना होने पर लाल चावलों की पेया को गोखरू और छोटी कटेरी के साथ सिद्ध करके पीये । यह पेया फलदायक तथा ज्वरनाशक है । (४) ज्वर-अतिसार के रोगी को चाहिये कि पृश्निपर्णी (पिठवन), खरैटी, बेलगिरी, सोंठ, नीला कमल (कमलगट्टा) और धनिया इनसे सिद्ध पेया को अनार के रस से खट्टा करके पान करे । (५) ज्वर रोगी को यदि कास, श्वास, हिचकी आती हो तो विदारी- गन्धादि गण से सिद्ध पेया को पिये । यह पेया अग्निदीपक और पसीना लाने वाली है । (विदारीगन्धादि गण मे अभिप्राय स्वल्प पञ्चमूल से है, विदारी- गन्धा, पृश्निपर्णी, बृहती, छोटी कटेरी और गोखरू) । (६) ज्वर-रोगी को मल रूखा और बधा आता हो तो उसको चाहिये कि जौ, पिप्पली, और आंवलो से सिद्ध पेया मे घी डालकर पान करे । यह पेया दोषो का अनुलोमन करती है । (७) यदि कोष्ठ मे कब्ज हो तथा पेट मे दर्द हो तो मुनक्का, पिप्पलीमूल, चव्य, आंवला और सोंठ से साधित पेया पीवे । (८) ज्वर मे यदि परिकर्त्तिका (मलत्याग के समय कटने के समान पीडा) होती हो तो खरैटी, वृक्षाम्ल (तिन्तडीक, कोकम, समाकदाना), खट्टे