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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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१८ चरकसंहिता [ अ० १

उपधा—भावदोष ही दुःख और दुःख के आश्रय भूत शरीर का मूल
कारण है। सब प्रकार की उपधा का परित्याग करना सब प्रकार के शारीरिक
एव मानसिक दुःखों के नाश का कारण है। जिस प्रकार रेशम का कीड़ा आप
ही सूत्रों को उत्पन्न करके स्वय उन घातक सूत्रों में बध जाता है, इसी प्रकार
मूढ, आतुर व्यक्ति विषयजन्य तृष्णा में फस जाता है। इसलिये मूढ़ मनुष्य
सदा दुःखी रहता है और जो ज्ञानी अग्नि के समान दुःखदायी विषयो को
जान कर इन से हट जाता है, तृष्णा नहीं रखता, कर्म नहीं करता, वह वीतराग
होने से शरीर, इन्द्रिय का सयोग न होने से दुःख नहीं भोगता। जन्म न होने
से दुःख नहीं होता १ ॥ ९५-६७ ॥
धीधृतिस्मृतिविभ्रंशः संप्राप्तिः कालकर्मणाम् ।
असात्म्यार्थागमश्चेति ज्ञातव्या दुःखहेतवः ॥ ६८ ॥
दुख के कारण—धी, धृति, स्मृति (ये प्रज्ञा के भेद है) इनका विभ्रंश
होना 'प्रज्ञापराध' है। काल अर्थात् परिणाम-काल और पूर्व कृत, कर्म और दैव
शब्द से कहे जाने वाले कर्म और असात्म्य-इन्द्रियार्थ सयोग ये दुःखों के कारण
है। कर्मजन्य रोगों का प्रज्ञापराध मे ही अन्तर्भाव करना चाहिये ॥ ६८ ॥
विषमाभिनिवेशो यो नित्यानित्ये हिताहिते ।
ज्ञेयः स बुद्धिविभ्रंशः, समं बुद्धिर्हि पश्यति ॥ ६६ ॥
नित्य और अनित्य, हित और अहित में सम के विपरीत जो विषम अर्थात्
यथावत् ज्ञान का अभाव है, उसे 'बुद्धि का विभ्रंश' समझना चाहिये। क्योंकि
बुद्धि नित्य अनित्य, हित और अहित को सम (यथार्थ) रूप में देखती है ॥६६॥
विषयप्रवणं चित्तं २ धृतिभ्रंशान्न शक्यते ।
नियन्तुमहितादर्थाद् धृतिर्हि नियमात्मिका ॥ १०० ॥
धृति मन का नियन्त्रण करती है। विषय की ओर जाते हुए मन का निय-
न्त्रण न करना 'धृतिभ्रंश' है। धृतिभ्रंश हो जाने से विषय की ओर लगा हुआ
चित्त अहित विषय से रोका नहीं जा सकता ॥ १०० ॥
तत्त्वज्ञाने स्मृतिर्यस्य रजोमोहावृतात्मनः ।
भ्रश्यते स स्मृतिभ्रंशः, स्मर्तव्य हि स्मृतौ स्थितम् ॥ १०१ ॥
स्मृतिभ्रंश—जिस पुरुष की स्मृति रज और तम से ढकी रहती है,
अतः वह पुरुष तत्त्वज्ञान का स्मरण नही कर सकता, इसको 'स्मृतिभ्रंश'
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१ 'वीतरागजन्मादर्शनात् ।” न्याय० ३ । १ । २५ ।
२ 'सत्त्व' इति पाठान्तरम् ।
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