BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 353 of 616

Read in context
Page 353

अ० ४ ] चिकित्सितस्थानम् ३३६ क्वाथ या इनके चूर्ण को वासा के क्वाथ मे शहद डालकर पीवे । ( ४ ) बोडे की लोद के रस मे पुण्डरीक काष्ठ और मधु तथा मुलहठी मिलाकर देना चाहिये । ( ५ ) गोबर के रस मे जवासा और भागरे की जड का चूर्ण मिलाकर चावलों के धोवन के साथ पीवे । ( ६ ) खैर, प्रियंगु, कचनार और सिम्बल के फूलो के चूर्ण को मधु के साथ मिलाकर चाटे, यह रक्तपित्त नाशक है । ( ७ ) सिंघाडा, खील, मौथा, खजूर और कमल का केशर इनको मधु के साथ चाटे । ( ८ ) जागल पशु पक्षियों के रक्त का शहद के साथ मिलाकर पीवे । यदि रक्त जमा हुआ (घट्ट) हो तो पारावत (कबूतर) की वीट को शहद के साथ चाटे ॥ ६२-७२ ॥ उशीर-कालीय क-लोध्र-पद्मक-प्रियङ्गुका-कट्फल शङ्ख-गैरिकाः । पृथक्पृथक् चन्दनतुल्यभागिकाः सशर्करास्तण्डुलधावनाप्लुताः ॥७३॥ रक्तं सपित्तं तमकं पिपासां दाहं च पीताः शमयन्ति सद्यः । किराततिक्तं क्रमुकं समुस्तं प्रपुण्डरीकं कमलोत्पले च ॥ ७४॥ ह्रीवेरमूलानि पटोलपत्रं दुरालभा पर्पटको मृणालम् । धनञ्जयोदुम्बर-वेतसत्वङ्-न्यग्रोध-शालेय-यवासक-त्वक् ॥ ७५ ॥ तुगालतावेतसतण्डुलीयँ ससारिवं मोचरसः समङ्गा । पृथक् पृथक् चन्दनयोजितानि तेनैव कल्पेन हितानि तत्र ॥ ७६ ॥ निशि स्थिता वा स्वरसीकृता वा कल्कीकृता वा मृदिता शृता वा । एते समस्ता गणाः पृथग्वा रक्तं सपित्तं शमयन्ति योगाः ॥ ७७ ॥ ( ६ ) खस, कालीयक (पीत काष्ठ), पठानी लोध, पद्माख, प्रियंगु, कायफल, शंख और शोधित स्वर्ण गेरू इनको पृथक् पृथक् चन्दन के समान मिलाकर खाड के समपरिमाण मे चावलों के धोवन के साथ देवे । ( १० ) प्रत्येक वस्तु के समान भाग चन्दन मिला कर दोनों के बराबर खाड मिलाकर इनको चावलों के धोवन के साथ देवे । इससे रक्तपित्त, तमक श्वास, प्यास, दाह शीघ्र शान्त होते है । ( ११ ) पुण्डरीक, कमल (श्वेत), नीला कमल, हीवेर (गन्धवाला) इनके मूल, परवल के पत्ते, दुरालभा, पित्तपापडा, मृणाल (बिसनाल), धनञ्जय (अर्जुन), गूलर, वेतस इनकी छाल, न्यग्रोध (बरगद), शालेय (चावलो का भेद या जामुन), बासे की छाल, तुगा (वशलोचन), लता (श्यामलता या प्रियंगु), नागकेशर, तण्डुलीय (चावल), सारिवा (अनन्त मूल), मोचरस, समगा (लाजवन्ती) इनको पृथक् पृथक् लेकर, चन्दन के

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान) · Page 353 of 616 · BharatKosha