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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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३४० चरकसंहिता [अ० ४ को लेकर उसका क्वाथ करे । इस क्वाथ मे इसी के फल का कल्क मिला कर घृत पकावे । इस घृत को शहद के साथ मिला कर खाने से रक्तपित्त अच्छा होता है । [कही २ 'सपलाशमूल' पाठ है । पाकविधि-गोधृत २ प्रस्थ, वासा के क्वाथ भाग ४ प्रस्थ, पानी ३२ प्रस्थ, शेष ४ प्रस्थ, कल्क (वासा के फूल का ) ४ पल यथाविधि पाक करना चाहिये । इसमें कल्क का परिमाण एक ग्रन्थ मे चार पल है । अष्टाग-सग्रह मे भी यह प्रयोग है । वहा पर टीकाकार ने चतु- र्थाश या छठा भाग कल्क डालना लिखा है ।] (२) ढाक के वृन्तो (आगे लगे पत्ते) के स्वरस मे इन्ही के कल्क के साथ घृत पाक करे । इस सिद्ध घृत को चतुर्थांश मधु के साथ चाटे । (३) इन्द्रजौ या कुडे के कल्क से घी सिद्ध करके, अथवा समगा (लाजवन्ती), नीला कमल, लोध इनसे सिद्ध घी का उपयोग करना चाहिये । इसी प्रकार त्रायमाणा के साथ, गूलर और परवल के पत्तो के साथ घृत को पकाना चाहिये । ये घृत तथा पित्त ज्वर को नाश करने वाले घृत रक्तपित्त मे उत्तम है ॥ ८८-६० ॥ अभ्यङ्गयोगाः परिषेचनानि सेकावगाहाः शयनानि वेश्म । शीतो विधिर्बस्तिविधानमग्र्यं पित्तज्वरे यत्प्रशमाय दृष्टम् ॥ ६१ ॥ तद्रक्तपित्ते निखिलेन कार्यं काल च मात्रा च पुरा समीक्ष्य । सर्पिर्गुडा ये च हिताः क्षतेभ्यस्ते रक्तपित्तं शमयन्ति सद्यः ॥ ६२ ॥ (१) पित्त ज्वर को नाश करने के लिये जो दाह ज्वरनाशक अभ्यग प्रयोग, परिषेक, अवगाहन, शमन घर तथा शीत विधि और बस्ति विधि कही है, इन सब को काल और मात्रा के अनुसार रक्तपित्त मे प्रयोग करे । उरःक्षत अध्याय मे जो सर्पिर्गुड कहे है वे सब रक्तपित्त को तुरन्त अच्छा कर देते है । सर्पिर्गुड उर क्षत के रोगियो के लिये हितकर है ॥ ६१-६२ ॥ कफानुबन्धे रुधिरे सपित्ते कण्ठागमे स्याद् ग्रथिते प्रयोगः । युक्तस्य युक्त्या मधुसर्पिषोश्च क्षारस्य चैवोत्पलनालजस्य ॥ ६३ ॥ (२) रक्तपित्त मे यदि कफ का अनुबन्ध हो, ग्रथित होने के कारण रक्त गले मे आकर रुक जाये तब कमलनाल के क्षार को मधु और घी के साथ मिला कर युक्तिपूर्वक प्रयोग करे ॥ ६३ ॥ मृणालपद्मोत्पलकेशराणां तथा पलाशस्य तथा प्रियङ्गोः । तथा मधूकस्य तथाऽसनस्य क्षाराः प्रयोज्या विधिनेव तेन ॥ ६४ ॥ (३) इसी प्रकार से कमलनाल, कमल का केसर, नीलोत्पल का केसर