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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० ५ ] चिकित्सितस्थानम् ३४६ यः स्पन्दते पिण्डित एव नाङ्गैश्चिरात्सशूलः समग्रगर्भलिङ्गः । स रौधिरः स्त्रीभव एव गुल्मो मासे व्यतीते दशमे चिकित्स्यः ॥ १६ ॥ रक्त-गुल्म का निदान—ऋतुकाल मे आहार न करने से, भय से (गर्भ- स्थिति के भयमात्र से ), रूक्ष आहार-विहार से, उपस्थित वेगो के रोकने से, रक्त-स्तम्भक ओषधियो से, वमन के प्रयोग से, योनि-दोष के कारण स्त्रियो मे रक्तजन्य गुल्म होता है । रक्तगुल्म के लक्षण—हाथ-पाव से रहित, पिण्डित मात्र, देर मे स्पन्द करता हे, गर्भ के समान (स्तन का भारी होना आदि) लक्षणो से युक्त रक्त- जन्य गुल्म स्त्रियो मे ही होता है ! इसकी चिकित्सा दसवे मास के पीछे करनी चाहिये । उस समय वह सुखसाध्य होता है। [ रक्तगुल्म आर्तव दर्शन के समय मे ही होता है । वृद्धा और कुमारियो मे जिनमे आर्तव नही होता, रक्त- गुल्म नही होता । रक्तगुल्म पुराना होने पर ही सुख साध्य होता है। वह पुराना होने पर पर्याप्त प्रमाण मे बडा हो जाता है और साथ ही स्वाभाविक गर्भाशय के आकुंचन इसको बाहर करने मे मदद करते है। दसवे मास मे ही प्रसव क्या प्रारम्भ होता हे, इसका सिवाय शरीर-धर्म के और कोई उत्तर नहीं ह ] ॥१८-१६॥ क्रियाक्रममतः सिद्धं गुल्मिनां गुल्मनाशनम् । प्रवक्ष्याम्यत ऊर्ध्वं च योगान् गुल्मनिबर्हणान् ॥ २० ॥ रूक्षव्यायामजं गुल्मं वातिकं तीव्रवेदनम् । बद्धविण्म मारुतं स्नेहैरादितः समुपाचरेत् ॥ २१ ॥ भोजनाभ्यञ्जनैः पानैर्निरूहैः सानुवासनैः । स्निग्धस्य भिषजा स्वेदः कर्तव्यो गुल्मशान्तये ॥ २२ ॥ स्रोतसा मार्दवं कृत्वा जित्वा मारुतमुल्बणम् । भित्त्वा विबन्धं स्निग्धस्य स्वेदो गुल्ममपोहति ॥ २३ ॥ स्नेहपानं हितं गुल्मे विशेषेणोर्ध्वनाभिजे । पक्वाशयगते बस्तिरुभयं जठराश्रये ॥ २४ ॥ गुल्म-रोगियो के लिये गुल्म को नष्ट करने वाला सिद्ध (अनुभूत) चिकित्सा- क्रम कहते है, उसके पीछे गुल्मनाशक योग कहेगे । वात-गुल्म की चिकित्सा—रूक्ष आहार और व्यायाम से उत्पन्न, तीव्र वेदना वाले, वायु और मल का अवरोध करने वाले वात-गुल्म की प्रथम स्नेहों द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । स्नेह के भोजन, अभ्यग, पान, निरूह बस्ति और अनुवासनो द्वारा रोगी को स्निग्ध बना कर गुल्म की शान्ति के लिये रोगी

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