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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० ५ ] २३ चिकित्सितस्थानम् ३५३ के दबाने पर भी स्तब्ध रहे, गुल्मस्थान मे ही सम्पूर्ण शूल एकत्र हो जाये तब गुल्म को पका समझना चाहिये । गुल्म के पक जाने पर जिन वैद्यो ने व्यधन, शोधन और रोपण काया मे अभ्यास किया हो, वे ही धन्वन्तरिय वैद्य शस्त्र-कर्म करे । यही इसकी चिकित्सा है ॥ ४२-४४ ॥ अन्तर्भागस्य चाप्येतत्पच्यमानस्य लक्षणम् । हृत्क्रोडशूनताऽन्तःस्थे बहिःस्थे पार्श्वनिर्गतिः ॥ ४५ ॥ पक्वः स्रोतांसि संक्लेद्य व्रजत्यूर्ध्वमधोऽपि वा । स्वयं प्रवृत्तं त दोषमुपेक्षेत हिताशनैः ॥ ४६ ॥ दशाहं द्वादशाहं वा रक्षन्भिषगुपद्रवान् । गुल्म क दो मार्ग हैं । यदि गुल्म पक कर अन्दर को मुख करता है तो 'अन्तःस्थ' और बाहर की ओर मुख करता है, तो 'बहिःस्थ' होता है अन्त.स्थ भाग वाले गुल्म के पकने पर भी उपरोक्त लक्षण होते हैं, साथ ही हृदय और क्रोड़ ( कुक्षि और उदर ) मे शूनता ( सूजन ) आती है । बहिःस्थिति मे सूजन पार्श्वो की ओर आ जाती है । गुल्म पक कर स्रोतों का क्लिन्न बना कर ऊपर वमन द्वारा अथवा नीचे की ओर मल के साथ प्रवृत्त होता है । अपने आप प्रवृत्त हुए दोष की पथ्याहार द्वारा दस या बारह दिनो तक उपद्रवो से रक्षा करते हुए उपेक्षा करनी चाहिये, दोषो को बहने देना चाहिये ॥ ४५-४६ ॥ अत ऊर्ध्वं हितं पानं सर्पिषः सविशोधनम् ॥ ४७ ॥ शुद्धस्य १ तिक्तं सक्षौद्रं प्रयोगे सर्पिरिष्यते । अन्तर्विद्रधिवच्चास्य कार्यं शोधनरोपणे २ ॥ ४८ ॥ इसके पश्चात् विशोधनयुक्त द्रव्यो से साधित घृत का पान करावे । पूय आदि का शोधन हो जाने पर तिक्त द्रव्यो से साधित घृत को मधु के साथ देवे पीछे से अन्तर्विद्रधि के समान शोधन और रोपण कार्य करे ॥ ४७-४८ ॥ शीतलैर्गुरुभिः स्निग्धैर्गुल्मे जाते कफात्मके । अवम्यस्याल्पकायाग्नेः कुर्याल्लङ्घनमादितः ॥ ४६ ॥ मन्दोऽग्निर्वेदना मन्दा गुरुस्तिमितकोष्ठता । सात्क्लेशा चारुचिर्यस्य स गुल्मी वमनोपगः ॥ ५० ॥ उष्णैरेवोपचर्यश्च कृते वमनलङ्घने । योज्याश्चाहारसंसर्गा भेषजैः कटुतिक्तकैः ॥ ५१ ॥ सानाहं सबिबन्धं च गुल्मं कठिनमुन्नतम् । १ ' शुद्ध सतिक्त' इति च पाठः । २ इद श्लोकार्धं क्वचिन्नास्ति ।