चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextअ० ८ ] चिकित्सितस्थानम् ४२५ प्रतिश्याय, शिरःशूल, कास, श्वास, स्वरभग और पार्श्वशूल मे नाना प्रकार की साधारण ( सशमनी ) चिकित्साए सुनो। (१) प्रतिश्याय मे—स्वेद, अभ्यग, धूप, आलेपन, परिषेक, अवगाहन, यावक ( यवान्न ), वाव्य ( यवमण्ड, जौ का दलिया ) इनका प्रयोग करे । (२) लाव, तीतर, मुर्गा और बटेर, इनके मासो से लवण, अम्ल कटु रसयुक्त उष्ण और घी आदि से युक्त मास रसो की कल्पना करे। (३) पिप्पली, जौ, कुलथी, सोठ, अनारदाना ( अनार का रस ) आवला इनके द्वारा साबित घी आदि से स्निग्ध बनाकर बकरी के मास का प्रयोग करे । इसके प्रयोग से प्रतिश्याय आदि छ विकार शान्त होते है। (४) मूली वा कुलथी से यथाविधि यूष सिद्ध करके अथवा जौ, गेहूँ, शालि के अन्न के सात्म्य के अनुसार रोगी को देवे । (५) वारुणी मद्य के ऊपर का स्वच्छ भाग अथवा विदारीगन्ध आदि पञ्चमूल से सिद्ध जल या धनिया ओर सोठ से साधित जल, अथवा तामलकी (भुई आवला) से सिद्ध जल, या चारो पर्णिनियो (मुद्गपर्णी, माषपर्णी शालपर्णी और पृश्निपर्णी) से सिद्ध जल पीने के लिये देवे । इनसे ही साधित जल मे या इनमे सस्कृत भक्ष्य बनाकर देवे ॥६४ ७०॥ कृशरोत्कारिकामाषकुलत्थयवपायसैः । संकरस्वेदविधिना कण्ठं पार्श्वमुरः शिरः ॥ ७१ ॥ स्वेदयेत्पत्रभङ्गेण शिरश्च परिषेचयेत् । बलागुडूचीमधुकश्रुतैर्वा वारिभिः सुखैः ॥ ७२ ॥ बस्तमत्स्यशिरोभिर्वा नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् । कण्ठे शिरसि पार्श्वे च पयोभिर्वा सवातकैः ॥ ७३ ॥ औदकानूपमांसानि सलिलं पाञ्चमूलिकम् । सस्नेहमारनालं वा नाडीस्वेदं प्रयोजयेत् ॥ ७४ ॥ जीवन्त्याः शतपुष्पाया बलाया मधुकस्य च । वचाया वेशवारस्य विदार्या मूलकस्य च ॥ ७५ ॥ औदकानूपमासानामुपनाहाश्च संस्कृताः । शस्यन्ते च चतुःस्नेहा शिरःपार्श्वांसशूलिनाम् ॥ ७६ ॥ शतपुष्पा समधुक कुष्ठ तगरचन्दने । आलेपनं स्यात्सघृत शिरःपार्श्वांसशूलनुत् ॥ ७७ ॥ स्वेदन—(१) कृशरा (तिल, चावल, उडद की यवागू), उत्कारिका (रोटी के समान बना खाद्य द्रव्य जौ आदि का ), उड़द, कुलथी, जौ, पायस