चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in context४४२ चरकसंहिता [अ० ६ ऋतु के अनुकूल स्नानो से, नूतन-स्वच्छ वस्त्रो के पहिनने से, सुन्दर मित्रो तथा स्त्रिया के दर्शन से, कर्णप्रिय गाने, बजाने की ध्वनि से, आनन्द और सान्त्वना से, गुरुओ के सत्सग से, ब्रह्मचर्य से, दान से, तप से, देवताओ की भक्ति से, सत्य से, शुभाचरण से, मगलग्रारी और अहिंसात्मक कार्यों से, वैद्य ओर ब्राह्मण की पूजा से ओर शुभ-कार्यो के करने से यक्ष्मा-रोग नष्ट हो जाता है ॥ १८४-१८८ ॥ यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुरा जितः । ता वेदविहितामिष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत् ॥ १८६ ॥ पुरातन काल में जिस यज्ञ क्रिया से यक्ष्मा रोग जीत लिया गया हो, उस वेदविहित यज्ञ को आरोग्य का इच्छुक पुरुष करे ॥ १८६ ॥ तत्र श्लोको—प्रागुत्पत्तिनिमित्तानि प्राग्रूप रूपसंग्रहः । समासाद् व्यासतःश्चोक्त भेषजं राजयक्ष्मणः ॥ १६० ॥ नामहेतुरसाध्यत्वं साध्यत्वं कृच्छ्रसाध्यता । इत्युक्तः संग्रहः कृत्स्नो राजयक्ष्मचिकित्सिते ॥ १६१ ॥ उपसहार—राजयक्ष्मा-रोग की उत्पत्ति, कारण, प्राग्-रूप, रूप तथा चिकित्सा का सक्षेप और विस्तार से कह दिया है। राजयक्ष्मा नाम का कारण, साध्यता, असाध्यता, कष्टसाध्यता ये सब राजयक्ष्म-चिकित्सा मे सग्रह कर दिये हैं ॥ १६०-१६१ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने राजयक्ष्मचिकित्सित नामाष्टमोऽध्याय ॥ ८ ॥ नवमोऽध्यायः अथात उन्मादचिकित्सित व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥ इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥ इसके आगे उन्माद की चिकित्सा कहते है। भगवान् आत्रेय ने ऐसा उपदेश किया है ॥ १-२ ॥ बुद्धिस्मृतिज्ञानतपोनिवासः पुनर्वसुः प्राणभृता शरण्यः । उन्मादहेत्वाकृतिभेषजानि कालेऽग्निवेशाय शशंस पृष्टः ॥ ३ ॥ बुद्धि (अवबोध), स्मृति (स्मरण), ज्ञान (तत्त्वज्ञान), तप (द्वन्द्व सहिष्णुता व्रत, तपश्चरण आदि) इनके निवास आश्रयभूत, प्राणियों की