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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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४४८ चरकसंहिता [अ० ६

एकान्त मे बातचीत करे, ऐसे प्रकृति वाले पुरुष को यक्षग्रह से उन्मत्त हुआ जाने ॥ २४ ॥ नष्टनिद्रमन्न-पान-द्वेषिणमनाहारमप्रतिबलिनं शस्त्र-शोणित-मांस-रक्त- माल्याभिलाषिणं सन्तर्जकं च राक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥ २५ ॥ (६) राक्षसोन्माद—रात को नींद न आये, रोगी रात को विचरे, खान- पान से द्वेप रखे, बिना आहार के भी अति बलवान् हो, शस्त्र, रक्त, मास, लाल माला की चाह करे ओर दूसरे को डाट का भय दिखावे, ऐसे व्यक्ति को राक्षस- ग्रह से उन्मत्त जाने ॥ २५ ॥ प्रहास-नृत्य-प्रधानं १ देव-विप्र-वैद्य-द्वेपावज्ञाभिः स्तुति- २ वेद-मन्त्र-शा- स्त्रोदाहरणैः काष्ठादिभिरात्मपीडनेन च ब्रह्मराक्षसोन्मत्तं विद्यात् ॥२६॥ (७) ब्रह्मराक्षस—हास्य करे और नृत्य करे, देव, ब्राह्मण और वैद्यो मे द्वेष, अनाहार तथा देवता आदि की स्तुति करे, वेद, मत्र, धर्मशास्त्र इनके अनेक उदाहरण दे, लकडी, डेले आदि से अपने शरीर को आघात पहुचावे, ऐसे व्यक्ति को ब्रह्मराक्षस से उन्मत्त समझे ॥२६॥ अस्वस्थचित्तं स्थानमलभमानं नृत्य-गीत-हासिनं बद्धाबद्धप्रलापिनं ३ संकर-कूट-मलिन-रथ्याचैल-तृणाश्म-काष्ठाधिरोहणरतिं ४ संभिन्न-रूक्ष- वर्ण-स्वरं नग्नं विधावन्तं नैकत्र तिष्ठन्तं दुःखान्यावेदयन्तं नष्टस्मृतिं च पिशाचोन्मत्तं विद्यात् ॥ २७ ॥ (८) पिशाचोन्माद—अस्वस्थ मन हो, नाचे, गावे, हसे, सम्बद्ध और असम्बद्ध बातचीत करे, संकर (झाडू से एकत्र किये धूल तिनके आदि), कूट (मिट्टी का ढेर), मैले रास्ते, मलिन वस्त्र, तिनके, पत्थर, लकडी इन पर चढने की प्रवृत्ति हो, जिसके वर्ण मिलेजुले हो, स्वर रूखा ओर एक समान न रहता हो (बदलता रहे), नगा रहे, इधर-उधर भागे, एक स्थान पर न बैठे, दूसरे के सामने अपने दुःख की कथा कहे तथा स्मृति नष्ट हो गई हो, ऐसे व्यक्ति को पिशाचग्रह से उन्मत्त समझे ॥ २७ ॥ तत्र शौचाचारं तपःस्वाध्यायकोविदं नर प्रायः शुक्लप्रतिपदि त्रयो- दश्या च देवाः, ज्ञान-शुचि-विविक्त-सेविनं धर्म-शास्त्र-श्रुति-काव्य-कुशलं प्रायः षष्टिनवम्योर्ऋषयः, मातृ-पितृगुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्योपसेविनं प्रायो दशम्याममावास्यायां च पितरः, गन्धर्वास्तु स्तुति-गीत-वादित्र-रति पर- १ 'प्रहासनृत्यवादिन' इति । २ 'वज्ञाभिस्तुति-' इति । ३. 'बद्धप्रभाषिण' इति च । ४. 'तृणेषु आरोहण-' इति च पाठः ।