चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
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४८२ चरकसंहिता [ अ० ११
( १७ ) सक्तु प्रयोग—मुलहठी आठ पल, सूखी दाख एक प्रस्थ इनके
क्वाथ मे पिप्पली का कल्क आठ पल मिला कर घी का एक प्रस्थ ( १६ पल )
सिद्ध करे । सिद्ध होने पर जब ठण्डा हो जाये तब मधु आठ पल, शर्करा
( खाण्ड ) आठ पल मिलावे । इस घी को सत्तू के समान भाग मे मिला कर
खांवे । यह घृत क्षतक्षीण और रक्तगुल्म रोगो मे हितकारी है ॥ ४८-४६ ॥
धात्रीफलविदारीक्षुजीवनीयरसाद् घृतात् ।
अजागोपयसोश्चैव सप्त प्रस्थान्पचेद्भिषग् ॥ ५० ॥
सिद्धशीते सिताक्षौद्र द्विप्रस्थं विनयेत्ततः ।
यक्ष्मापस्मारपित्तासृक्कासमेहक्षयापहम् ॥ ५१ ॥
वयःस्थापनमायुष्यं मांसशुक्रबलप्रदम् ।
( १८ ) आवले का रस एक प्रस्थ, विदारी का रस एक प्रस्थ, गन्ने का
रस एक प्रस्थ, जीवनीय गण का रस एक प्रस्थ, बकरी का दूध एक प्रस्थ,
गाय का दूध एक प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, इन सात वस्तुओ को पकावे । इस घृत
के शीतल होने पर शर्करा एक प्रस्थ ( १६ पल ) और मधु एक प्रस्थ मिलावे ।
यह घृत यक्ष्मा, अपस्मार, रक्तपित्त, कास, प्रमेह और क्षय को नष्ट करता है,
यौवन को बनाये रखन और बुढापे को दूर करने वाला, आयुर्वर्धक और मास
शुक्र तथा बल को बढाता है ॥ ५०-५१-॥
घृतं तु पित्तेऽभ्यधिके लिह्याद्वातेऽधिके पिबेत् ॥ ५२ ॥
लीढं निर्वापयेत्पित्तमल्पत्वाद्वन्ति नानलम् ।
आक्रामत्यनिलं पीतमूष्माणं निरुणद्धि च ॥ ५३ ॥
( १६ ) पित्त के प्रबल होने पर घी चाटे, वायु के अधिक होने पर घृतका
पान करे । पित्त के अधिक होने पर चाटा हुआ घृत पित्त को तो शान्त करता
है और मात्रा में थोड़ा होने से जाठर-अग्नि का नाश नही करता । वायु के
अधिकता मे पिया हुआ घृत स्निग्ध और गुरु होने से वायु को शमन करता है
वायु रूक्ष और लघु होता है । बलवान् वायु पक्वाशय से जिस उष्णिमा को ले
जा रहा हो, उसको शान्त करता है ॥ ५२-५३ ॥
क्षामक्षीणकृशाङ्गानामेतान्येव घृतानि च ।
त्वक्क्षीरीशर्करालाजचूर्णैः स्यानानि१ योजयेत् ॥ ५४ ॥
क्षाम (क्रान्त शरीर), क्षीण और कृश अगो-वाले व्यक्तियों मे उपरोक्त घृत
१ 'पानानि' च पाठः ।