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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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४८६ चरकसंहिता [अ० ११ योनिदोषक्षतस्रावहतानां चापि योषिताम् ॥ ७६ ॥ गर्भार्थिनीनां गर्भश्च स्रवेद् यासां म्रियेत वा । धन्या बल्या हितास्ताभ्यः शुक्रशोणितवर्धनाः ॥ ७७ ॥ इति सर्पिर्मोदकः । सर्पिर्मोदक—गाय का दूध आधा आढक, घी एक प्रस्थ, गन्ने का रस एक आढक, विदारी का स्वरस एक प्रस्थ, तीतर का मांस रस एक प्रस्थ इन सब को मिला कर पकावे । जब यह सिद्धहो जाय तब इसमें महुए का फूल चारपल, पियाल चार पल, वंशलोचन दो पल, खजूर बीस पल, बिभीतक की मज्जा बीस पल, पिप्पली चार पल, खाण्ड (गुड) बीस पल, मुलहठी एक कर्ष जीवनीय गण की प्रत्येक औषधि आधा पल लेकर इन सब को गन्ने के रस में बारीक पीस कर सिद्ध किये घृत में मिला देवे । [ अथवा महुए के फूल आदि वस्तुओ को गन्ने के रस में पीस कर इनका कल्क बनाले, फिर गाय का दूध आदि व- स्तुओ में इसको मिला कर घृतपाक विधि से घृत बनाले ]। इस प्रकार से घृत के सिद्धहोने पर मधु एक कुडव, मरिच, अजाजी (कृष्ण जीरा) प्रत्येक एक एक पल मिला कर मोदक (लड्डू) बनवावे । ये मोदक वात रक्त, रक्तपित्त, उरःक्षत, कास, क्षय, छाती में स्थित रक्त में, शोषरोगी, क्षीणशुक्र, कृश, दुर्बल, वृद्ध, पुष्टि, बल, वर्ण का चाहने वालो के लिये, योनि दोष और रक्तस्राव से पीड़ित स्त्रियो और बन्ध्या स्त्रियो वा जिनका गर्भ गिर जाता या मर जाता हो उनके लिये हितकारी है । ये मोदक धन्य, बलवर्धक, वीर्य और रक्त को बढ़ाते है ॥ ७०-७७ ॥ बस्तिदेशे विकुर्वाणे स्त्रीप्रसक्तस्य मारुते । वातघ्नान् बृंहणान् वृष्यान् योगांस्तस्य प्रयोजयेत् ॥ ७८ ॥ स्त्रीसेवी अति कामी पुरुष के बस्ति प्रदेश से यदि वायु शूलादि विकार उत्पन्न करे, तब वातनाशक, बृंहण वृष्य योगों का प्रयोग करे ॥ ७८ ॥ शर्करापिप्पलीचूर्णैः सर्पिषा माक्षिकेण वा । संयुक्तं वा शृतं क्षीरं पिबेत्कासज्वरापहम् ॥ ७९ ॥ (१) गरम दूध के साथ शर्करा और पिप्पली के चूर्ण को अथवा (२) शर्करा और पिप्पली के चूर्ण को घी वा मधु के साथ लेने से कासज्वर नष्ट होता है ॥ ७९ ॥ फलाम्लं सर्पिषा भृष्टं विदारीक्षुरसे शृतम् । स्त्रीषु क्षीणः पिबेद्यूषं जीवनं बृंहणं परम् ॥ ८० ॥