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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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अ० १३ ] ३३ चिकित्सितस्थानम् ५१३ भगवन्नुदरैर्दुःखैर्दृश्यन्ते ह्यर्दिता नराः । शुष्कवक्त्राः कृशाङ्गाश्चाध्मातोदरकुक्षयः ॥ ५ ॥ प्रनष्टाग्निबलाहाराः सर्वचेष्टास्वनीश्वराः । दीनाः प्रतिक्रियाभावाज्जहतोऽसूननाथवत् ॥ ६ ॥ भगवन् ! बहुत से लोग दुखदायी उदर रोगो से पीड़ित होते हैं, उनके सूखे हुए मुख, शरीर निर्बल, पेट और कोख फूले हुए दीखते है । इन उदर रोगियो की अग्नि, बल और आहार ( भूख ) नष्ट हो जाते हैं । वे किसी काम को करने मे भी समर्थ नही होते, ये दीन हुए, उचित चिकित्सा न करने पर अनाथों के समान प्राणो को त्याग देते है ॥ ५-६ ॥ तेषामायतनं संख्या प्राग्रूपाकृतिभेषजम् । यथावज्ज्ञातुमिच्छामि गुरुणा सम्यगीरितम् ॥ ७ ॥ सर्वभूतहितार्थिः शिष्येणैवं प्रचोदितः । सर्वभूतहितं वाक्यं व्याहर्तुमुपचक्रमे ॥ ८ ॥ इन उदर रोगो के कारण, सख्या, प्राग्रूप ( पूर्वरूप ), आकृति ( रूप ) और भेषज ( औषध ) के विषय मे आपका भली प्रकार उपदेश सुनना चाहता हूँ । अग्निवेश के इस प्रकार पूछने पर सब प्राणियो के लिये आत्रेय ऋषि ने सब प्राणियो को हितकारी वाक्य कहना आरम्भ किया ॥ ७-८ ॥ अग्निदोषान्मनुष्याणां रोगसङ्घाः पृथग्विधाः । मलवृद्ध्या प्रवर्तन्ते विशेषेणोदराणि तु ॥ ६ ॥ मन्देऽग्नौ मलिनैर्भुक्तैरपाकाद्दोषसंचयः । प्राणाग्न्यपानान्संदूष्य मार्गान् रुद्ध्वाऽधरोत्तरान् ॥ १० ॥ त्वङ्मांसान्तरमागत्य कुक्षिमाध्मापयन्भृशम् । जनयत्युदरं, तस्य हेतुं शृणु सलक्षणम् ॥ ११ ॥ अग्नि के मन्द होने से, मल की वृद्धि होने पर मनुष्यों मे नाना प्रकार के रोग समूह उत्पन्न होते है, और उदर राग विशेष रूप से उत्पन्न होते है । अग्नि के मन्द होने पर, अन्न के पचन न होने पर, मलिन, मलकारक अपथ्य आहार के सेवन से दोष संचित होने पर प्राण, अग्नि ( जाठराग्नि ), और अपान वायु को दूषित करके अधर और उत्तर ( ऊपर और नीचे के ) दोनो मार्गों को रोक देते है । यह दोष-समूह त्वचा और मास के बीच मे आकर कुक्षि ( उदर, कोख ) को बहुत अधिक फुला करके उदर रोग को उत्पन्न करते हैं उसके कारण और लक्षणों को सुनो ॥ ६-११ ॥