चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
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Read in contextस सर्वगः सर्वशरीरभृच्च स विश्वकर्मा स च विश्वरूपः । स चेतनाधातुरतीन्द्रियश्च स नित्ययुक्त सानुशयः स एव ॥ ३२ ॥ वह आत्मा कर्मो के कारण सब स्थानो में गमन करता है, देवता मनुष्य, तिर्यग् आदि सब देहो को धारण करता है, यह सब कर्मों के करने में समर्थ होने से 'विश्वकर्मा' है। यह आत्मा सर्व रूप होने से विश्वरूप है, यही चेतना धातु है, वह अतीन्द्रिय है। इसका कर्म आदि से नित्य सम्बन्ध है यही अनुशय (राग और द्वेष आदि) के साथ रहता है ॥ ३२ ॥ रसात्ममातापितृसंभवानि भूतानि विद्याद्दश षट् च देहे। चत्वारि तत्रात्मनि संश्रितानि स्थितस्तथाऽऽत्मा च चतुर्षु तेषु॥३३॥ भूतानि मातापितृसम्भवानि रजश्च शुक्रं च वदन्ति गर्भे । आप्यायते शुक्रमसृक्च भूतैर्यैस्तानि भूतानि रसोद्भवानि ॥३४॥ आहार के रस, आत्मकृत कर्म, माता और पिता इनसे उत्पन्न ये चार २ गुण वाले चार भूत (इस प्रकार से १६ भूत) गर्भ के शरीर में रहते हैं। इन सोलह के बीच में चार सूक्ष्म लिंग-शरीर रूप से (वायु, अग्नि, भूमि और जल तन्मात्रा रूप से) आत्मा में और ये चारों आत्मा में आश्रित है। गर्भ में माता से उत्पन्न चार भूत और पिता से उत्पन्न चार भूत और क्रम से रज और शुक्र ये पदार्थ गर्भ में कहे जाते हैं। भूतों द्वारा शुक्र और रक्त दानों का पोषण होता है और उन रस से उत्पन्न भूतो का पोषण और वृद्धि होती है। इस प्रकार से गर्भ के शरीर में १६ भूतों का योग होता है ॥ ३३-३४ ॥ भूतानि चत्वारि तु कर्मजानि यान्यात्मलीनानि विशन्ति गर्भम् । स बीजधर्मा ह्यपरापराणि देहान्तराण्यात्मनि याति याति ॥३५॥ आत्मा में गुप्त रूप से विद्यमान कर्म से उत्पन्न जो चार सूक्ष्म भूत गर्भ में प्रविष्ट होते हैं, वही सूक्ष्म शरीरी पुरुष बीज के समान धर्म वाला होकर एक के बाद दूसरे शरीरों में जाता रहता है। वह सूक्ष्म शरीर आत्मा पर आश्रित रहता है 🌼 ॥ ३५ ॥ रूपाद्धि रूपप्रभवः प्रसिद्धः कर्मात्मकानां मनसो मनस्तः । भवन्ति ये त्वाकृतिबुद्धिभेदा रजस्तमस्तत्र च कर्महेतु ॥३६॥ गर्भ के शरीर को बनाने वाले कर्मात्मक भूतोंके सूक्ष्म रूप से स्थूल रूप तथा मन से मन की उत्पत्ति होती है यह बात प्रसिद्ध है । कारण के अनुसार कार्य होता है । [ पूर्व जन्म में जैसा मन होता है, वैसा इस जन्म में भी हो 🌼 ससरति निरुपभोग भावैरधिवासित लिङ्गम् । सा० का० ४० ॥