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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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३८ चरकसंहिता [ अ० २

इससे विपरीत अधार्मिक क्रियाये पुरुष को शोक के अवान कर देती हैं । शरीर
और मन से उत्पन्न रोग जब तक शरीर और मन हैं, तब तक बार बार होते
रहते हैं । शरीर और मन की चेष्टा न रहने पर ये रोग भी फिर नहीं होते ।
रूप ( शरीर ) और सत्त्व ( मन ) इनका जो प्रवाह है उसका आदि नही
बतलाया अर्थात् वह अनादि है । आत्मा का शरीर और मन के साथ प्रथम
सम्बन्ध कब हुआ, इसे कोई नहीं कह सकता । शरीर और मन की निवृत्ति श्रेष्ठ
धृति ( धैर्य ) एव स्मृति तथा श्रेष्ठ बुद्धि से होती है । शरीर और मन ये दो
प्रकार के आश्रय होने से रोगो की उत्पत्ति से पूर्व ही प्रतिकार करना चाहिये ।
यदि रोगोत्पादक विपाक काल के साथ दैव सयुक्त नहीं है तो जितेन्द्रिय पुरुष
को रोग नहीं सताते । पूर्व कर्म से उत्पन्न व्याधिया तो कर्म के क्षय के बिना
शान्त नहीं होतीं ❄ ॥ ४०-४३ ॥
दैवं पुरा यत्कृतमुच्यते तत्, तत्पौरुषं यच्चिह कर्म दृष्टम् ।
प्रवृत्तिहेतुर्विषमः स दृष्टो निवृत्तिहेतुस्तु समः स एव ॥ ४४ ॥
पूर्वजन्म मे किये कर्म को 'दैव' कहा जाता है । इस जन्म मे जो कर्म
किया जाता है, उसे 'पौरुष' कहते हैं । ये दोनो कर्म अयोग, अतियोग और
मिथ्यायोग से विषम हैं । ये विषम रूप से रोग की प्रवृत्ति या ससार की प्रवृत्ति
में कारण हैं। इनका समान योग 'आरोग्य' या 'ससार निवृत्ति' अर्थात् मोक्ष
मे कारण है ॥ ४४ ॥
हैमन्तिकं दोषचयं वसन्ते प्रवाहयन् ग्रैष्मिकमभ्रकाले ।
घनात्यये वार्षिकमाशु सम्यक्प्राप्नोति रोगानृतुजान्न जातु ॥ ४५ ॥
वात, पित्त, कफ का संचय क्रम से ग्रीष्म, वर्षा और शिशिर मे होता है
और इनका प्रकोप क्रम से वषा, शरद् और वसन्त में होता है । इन में ग्रीष्म
में हुए दोष के सचय ( वात ) को वर्षा काल में, वर्षा काल मे सचित दोष
( पित्त ) को वर्षा काल के अनन्तर शरत् काल में तथा हेमन्त काल के सचित
दोष ( कफ ) को वसन्त अर्थात् चैत्र मे भली प्रकार प्रवाहित करके देह से
निकाल देवे तो मनुष्य को ऋतुजन्य रोग नहीं होते † ॥ ४५ ॥
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❄ देखिये चरक० शारीर, अ० १ मे— 'क्रियाघ्नाः कर्मजा रोगाः प्रशम
यान्ति तत्क्षयात् ।'
† दोष-प्रवाहण का नियम— प्रत्येक ऋतु के प्रथम मास में दोष प्रवाहण
करना चाहिये । यथा— 'माधवप्रथमे मासि नभस्य' प्रथमे पुन ।
सहस्य प्रथमे चैव हारयेद्दोषसञ्चयम् ॥