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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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४६ चरकसंहिता [ अ० ३

सात्म्य से गर्भ उत्पन्न होता है। असात्म्य-सेवन के बिना स्त्री पुरुष मे बांझ पन या नपुसकता नहीं आती, अथवा गर्भ मे अनिष्ट दोष उत्पन्न नहीं होता। असात्म्यसेवी स्त्री पुरुषों मे कुपित हुए तीनो वात आदि दोष जब तक शरीर में फैल कर शुक्र आत्तव और गर्भाशय के नाश का कारण नहीं बनते, तब तक ये स्त्री पुरुष गर्भ उत्पन्न करने में समर्थ रहते हैं। सात्म्यसेवी स्त्री पुरुषो के शुद्ध शुक्र और आत्र्त्तव तथा गर्भाशय के शुद्ध होने पर ऋतुकाल में सम्भोग द्वारा परस्पर मिल जाने पर भी जीव के प्रवेश न होने से गर्भ उत्पन्न नहीं होता। क्योकि गर्भ की उत्पत्ति केवल सात्म्य पर ही निर्भर नहीं करती। गर्भोत्पत्ति में समुदाय कारण है। गर्भ की जो बाते सात्म्य से उत्पन्न होती हैं या सात्म्य के होने पर ही जिनका होना सम्भव है, उनका वर्णन करते हैं। जैसे—आरोग्य, अप्रमाद, लोभ का न होना, इन्द्रियो का सौम्य भाव, प्रसन्नता, उत्तम स्वर, उत्तम वर्ण, उत्तम बीज (शुक्र) और मैथुन मे हर्ष की अधिकता ये सात्म्य से उत्पन्न होने वाले अश हैं ॥ १८ ॥

रसजश्चायं गर्भः । न हि रसादृते मातुः प्राणयात्राऽपि स्यात्किं पुनर्गर्भजन्म, न चैवमसम्यगुपयुज्यमाना रसा गर्भमभिनिर्वर्तयन्ति, न च केवल सम्यगुपयोगादेव रसानां गर्भाभिनिर्वृत्तिर्भवति, समु- दायोऽप्यत्र कारणमुच्यते, यानि तु खल्वस्य गर्भस्य रसजानि, यानि चास्य रसतः सम्भवतः सम्भवन्ति, तान्यनुव्याख्यास्याम, तद्यथा— शरीरस्याभिनिर्वृत्तिरभिवृद्धिः प्राणानुबन्धस्तृप्तिः पुष्टिरुत्साहश्चेति रसजानि ॥ १६ ॥

यह गर्भ रस से उत्पन्न होता है । रस के विना तो माता की भी जीवन- यात्रा नहीं चल सकती, फिर गर्भ के जन्म की तो बात ही क्या ? गर्भिणी के रसों को अनुचित रीति में सेवन करने से भी गर्भ नही बनता और रसो के सम्यग् उपयोग मात्र से भी गर्भ नहीं बनता। गर्भोत्पत्ति मे माता आदि का समुदाय भी कारण है। इस गर्भ के जो अंश रस से उत्पन्न होते हैं, या जिन अशो का रस के रहते हुए ही बनना सम्भव है, उनका वर्णन करते हैं। जैसे— शरीर के प्रत्येक अग की पृथक् २ स्पष्टता, वृद्धि, प्राणों का, बल का अनुबन्ध अर्थात् स्थिर रहना, तृप्ति, पुष्टि, उपचय और उत्साह । ये अंश रस से उत्पन्न होते हैं ॥ १९ ॥

अस्ति खल्वपि सत्त्वमुपपादुकं यज्जीव स्पृक् शरीरेणाभिसंबध्नाति, यस्मिन्नपगमनपुरस्कृते शीलमस्य व्यावर्तते, भक्तिर्विपर्यस्यते, सर्वेन्द्रि-