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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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४८ चरकसंहिता [ अ० ३

है, अन्यत्र नहीं। 'स्पृक्' इस विशेषण से मूत्र, नख, केश आदि मे मन को गति नहीं होने से आत्मा को ज्ञान नहीं होता ] । यह सत्त्व तीन प्रकार का बतलाया जाता है । शुद्ध, राजस और तामस । इस जन्म से देहान्तर में जाते समय मन के साथ से जो गुण अधिक मात्रा में होगा, दूसरे जन्म में भी वही गुण अधिक मात्रा मे रहेगा । जिस समय मन में शुद्ध सत्त्व की प्रधानता रहती है उस समय जीव अतीत जाति का भी स्मरण करता है । ॐ आत्मा का यह स्मृति के योग्य ज्ञान शुद्ध सात्त्विक मन के योग से होता है। जिस ज्ञान को मान कर पुरुष 'जातिस्मर' अर्थात् पूर्वजन्म को स्मरण करने वाला कहा जाता है । इस प्रकार मन का विवेचन किया । गर्भ के जा अश सत्त्व ( मन ) से उत्पन्न होते हैं या जो सत्त्व ( मन ) के होने पर ही होना सम्भव हैं, उनका वर्णन करते हैं । जैसे—भक्ति, शील, पवित्रता, द्वेष, स्मृति, मोह, त्याग, मत्सरता, शूरता, भय, क्रोध, तन्द्रा, उत्साह, तीक्ष्णता, मृदुता, गम्भीरता, मन की अस्थिरता, आदि तथा अन्य अनेक सत्त्व से उत्पन्न होने वाले विकार हैं जिनका सत्त्व का भेद वर्णन करने वाले प्रकरण में करेगे । यह सत्त्व से उत्पन्न होने वाले अशो का विषय समाप्त हुआ । ये सत्त्व नाना प्रकार के हैं । ये सब एक पुरुष में रहते हैं, परन्तु वे सब समय में नहीं रहते । प्राय सत्त्व एक ही रहता है इसलिये मन एक ही प्रकार का कहा जाता है । इनमे जिस एक को प्रधानता रहती है, उसी गुण से वह कहा जाता है । सत्त्व की अधिकता से सात्त्विक, रज की अधिकता से राजस, तम की अधिकता से तामस कहा जाता है ॥ २० ॥ एवमय नानाविधानामेषां गर्भकराणां भावानां समुदायादभिनिर्वर्तते गर्भः, यथा कूटागार नानाद्रव्यसमुदायात्, यथा वा रथो नानारथाङ्ग- समुदायात्, तस्मादेतदवोचाम-मातृजश्चार्यं गर्भः पितृजश्चाऽऽत्मजश्च सात्म्यजश्च रसजश्च । अस्ति च सत्त्वमुपपादुकमिति होवाच भगवानात्रेयः ॥ २१ ॥ इस प्रकार से इन नाना प्रकार के गर्भ के उत्पादक पदार्थों ( भावो ) के मिलने से गर्भ बनता है । जिस प्रकार जेन्ताक स्वेद में कहे नाना द्रव्यों के समूह से कूटागार बनता है, जिस प्रकार रथ के नाना अगों के समुदाय से रथ बनता है, उसी प्रकार माता आदि सब छ पदार्थों के मिलने से गर्भ बनता है । इसीलिये हम कहते हैं गर्भ माता से उत्पन्न होता है, पिता से उत्पन्न होता है,


ॐ देखिये सुश्रुत, शारीर स्थान, अध्याय २ ।