BharatKosha
चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

Page 65 of 616

Read in context
Page 65

५० चरकसंहिता [ अ० ३

कानों से ही शब्दों को सुनता है, अपनी नासिका से गन्धों को पहिचानता है, अपनी ही रसना से रसों को पहिचानता है, अपनी ही त्वचा से स्पर्श करता है, अपनी बुद्धि से जानने योग्य बातों को जानता है, इस कारण से जड़ आदि माता पिता से उत्पन्न सन्तान पूर्ण रूप से पिता के समान नहीं होती तो प्रतिज्ञा- हानि दोष आता है । क्योंकि ऐसा मानने से आत्मा इन्द्रियो के रहते ज्ञानी और न रहते अज्ञानी हो जाता है । इस प्रकार आत्मा में ज्ञानी और अज्ञानी ये दोनों गुण होने सम्भव हों वह आत्मा विकार-प्रकृतिवाला हो जायेगा, परन्तु आत्मा ‘निर्विकार’ कहा जाता है । यदि चक्षु आदि इन्द्रियों से युक्त होने पर आत्मा विषयों को जानता है, तो वह निरिन्द्रिय अवस्था में ( चक्षु आदि के अभाव में ) अज्ञानी बनेगा । अज्ञ होने से अपने उत्पत्ति का कारण भी नहीं हो सकेगा । कारण न होने से आत्मा की सत्ता भी नहीं रही । इसलिये ‘आत्मा’ यह वचन कहना अर्थरहित शब्दमात्र ही रह जाता है ॥ २२ ॥

आत्रेय उवाच—पुरस्तादेतत्प्रतिज्ञातं—सत्त्वं जीवस्पृक् शरीरेणा- भिसंबध्नातीति, तस्मात्तु समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्रहेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते । तद्वक्ष्यामः-॥ २३ ॥

भगवान् आत्रेय ने कहा—प्रथम यह कहा है कि सत्त्वसंज्ञक मन जीव आत्मा को स्पृक्शरीर के साथ का सम्बन्ध कराता है, क्योंकि समुदाय द्वारा उत्पन्न गर्भ मनुष्य रूप से बनता है, मनुष्य से मनुष्य ही उत्पन्न होता कहा जाता है, उसकी व्याख्या करते हैं ॥ २३ ॥

भूताना चतुर्विधा योनिर्भवति—जरायुवाण्डस्वेदोद्भिदः । तासा खलु चतसृणामपि योनीनामेकैका योनिरपरिसंख्येयभेदा भवति, भूता- नामाकृतिविशेषापरिसंख्येयत्वात् । तत्र जरायुजानामण्डजाना च प्राणि- नामेते गर्भकरा भावा यां या योनिमापद्यन्ते तस्यां तस्यां योनौ तथा- तथारूपा भवन्ति, तद्यथा कनक-रजत-ताम्र-त्रपु-सीसकान्यासिच्यमा- नानि तेषु तेषु मधूच्छिष्टविग्रहेषु। ते यदा मनुष्यबिम्बमापद्यन्ते तदा मनुष्यविग्रहेण जायन्ते, तस्मात्समुदायात्मकः सन् गर्भो मनुष्यविग्र- हेण जायते, मनुष्यो मनुष्यप्रभव इत्युच्यते, तयोनित्वात् ॥ २४ ॥

प्राणियों की योनि चार प्रकार की है । जरायु, अण्ड, स्वेद और उद्भिद् इन चारों प्रकार की योनियों में एक एक योनि के असख्य भेद हैं, क्योंकि प्राणी की आकृतियों के भेद असख्य हैं । इन में जरायुज तथा अण्डज प्राणियों के गर्भोत्पादक शुक्र, शोणित आदि पदार्थ जिस जिस योनि में पहुचते हैं, उसी उसी योनि में उसी उसी रूप के हो