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चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation

by महर्षि चरक व दृढ़बल

Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)

DevanagariSanskritpublished616 pages

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५४ चरकसंहिता [अ० ४ मातृजः पितृज आत्मजः सात्म्यजो रसजः सत्त्वज इत्येतेभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भः संभवति। तस्य येऽवयवा यतो यतः संभवतः संभवन्ति तान्विभज्य मातृजादीनवयवान् पृथक्पृथगुक्तमग्रे ॥ ४ ॥ माता, पिता, आत्मा, सात्म्य, रस, सत्त्व इन छ भावों के समुदाय से गर्भ बनता है। इस गर्भ के जो जो अवयव जिस जिस पदार्थ से उत्पन्न होते हैं, उन सब माता आदि पदार्थों को पृथक् पृथक् रूप मे विभाग करके प्रथम कह चुके हैं ॥ ४ ॥ शुक्रशोणितजीवसंयोगे तु खलु कुक्षिगते गर्भसंज्ञा भवति ॥ ५ ॥ जिस समय गर्भाशय में शुक्र, शोणित और जीव (आत्मा) का संयोग होता है, उस समय इनकी 'गर्भ' संज्ञा होती है ॥ ५ ॥ गर्भस्तु खल्वन्तरिक्ष-वाय्वग्नि-तोय-भूमि-विकारश्चेतनाधिष्ठान भूतः। एवमनयैव युक्त्या पञ्चमहाभूतविकारसमुदायात्मका गर्भश्चेत- नाधात्वधिष्ठानभूतः, स ह्यस्य षष्ठो धातुरुक्तः ॥ ६ ॥ गर्भ आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी इन पंच महाभूतों के विकार तथा चेतना इन छः धातुओं का अधिष्ठान अर्थात् आश्रय है। इस प्रकार से यह ५च महाभूतो के विकार से बना गर्भ चेतना (आत्मा) धातु का आश्रय होता है। यही चेतना (आत्मा) इस गर्भ का छठा धातु कहाता है। [धारण करने से 'धातु' कहाता है। आत्मा गर्भ को धारण करता है, इसलिये इसे भी 'धातु' शब्द से कहा है।] ॥ ६ ॥ यथा चाऽऽनुपूर्व्याऽभिनिर्वर्तते कुक्षौ तदनुव्याख्यास्यामः-गते पुराणे रजसि नवे चावस्थिते,पुनः शुद्धस्नानां स्त्रियमव्यापन्न-योनि-शोणित-गर्भा- शयामृतुमतीमाचक्ष्महे, तया सह तथाभूतया यदा पुमानव्यापन्नबीजो मिश्रीभाव गच्छति तस्य हर्षोदीरितः पर शरीरधात्वात्मा शुक्रभूतोऽ- ङ्गादङ्गात्सभवति, स तथा हर्षभूतेनात्मनोदीरितश्चाधिष्ठितश्च बीजरूपो धातुः पुरुषशरीरादभिनिष्पत्योचितेन पथा गर्भाशयमनुप्रविश्याऽऽर्तवे- नाभिसंसर्गमेति ॥ ७ ॥ गर्भाशय में जिस क्रम से गर्भ का विकास होता है उसका वर्णन करते हैं- पुराने ऋतुकाल के क्रम से संचित रज के निवृत्त होने और नये रज के उप- स्थित होने पर स्नान क्रिया द्वारा शुद्ध हुई, रोग रहित योनि, आर्तव और गर्भा- शयवाली स्त्री को हम 'ऋतुमती' कहते हैं। इस ऋतुमती स्त्री के साथ रोग- रहित बीजवाला पुरुष जिस समय संयोग करता है, उस समय हर्ष के कारण

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