चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)

चरक संहिता (द्वितीय भाग: चिकित्सा, कल्प व सिद्धि स्थान)
Charaka Samhita Part 2 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व दृढ़बल
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
DevanagariSanskritpublished616 pages
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५८ चरकसंहिता [ अ० ४
तथायुक्तानि चापराणि स्त्रीकराणि, अतो विपरीतानि पुरुषकराणि, उभ-
यभागावयवा नपुंसककराणि ॥ १५ ॥
इस प्रकार से इस गर्भ की इन्द्रिया, अंग और अवयव एक साथ बनने
प्रारम्भ हो जाते है। परन्तु जो पदार्थ इस गर्भ की उत्पत्ति के पीछे बनते
हैं, वे गर्भ में बनने आरम्भ नहीं होते । जैसे-दात, व्यञ्जन, (मूँछ, दाढ़ी
आदि) शुक्र और रज की उत्पत्ति तथा स्थूल मास आदि ये देर में उत्पत्ति के
पीछे बनने प्रारम्भ होते हैं। यह तो मनुष्य की प्रकृति अर्थात् स्वभाव है और
इसके विपरीत जब कभी दात आदि गर्भ में ही बन जाते हैं, तब यह विकृति
कहाती है। इस गर्भ में कुछ पदार्थ नित्य होते हैं। जो जब तक शरीर रहता
है तब तक रहते हैं जमे-हाथ, पाँव आदि और कुछ भाव अनित्य हैं जो
शरीर के साथ सदा नहीं रहते जैसे-दान आदि । इस गर्भ मे शरीर के
साथ जो अग या अवयव रहते हैं वे ही अवयव स्त्रीलिंग पुरुपलिंग या नपुंसक-
लिंग के लक्षणों को धारण करते हैं। इनमें स्त्री और पुरुष के लक्षणों में ज-
विशेष लक्षण भेदक होते हैं, वे प्रधान या मुख्य होते हैं, जिन गुणों की प्रथा-
नता वा अधिकता रहती है, वही विशेष लिंग या चिह्न बनते हैं। अधिकता न
रहने पर वे विपरीत होते हैं। जैसे-क्लीवता, भीरुत्व, मोह, चंचलता, कटि से
निचले भाग का भारी होना, शरीर का संगठित न होना, शिथिलता, कोमलता
तथा स्तन आदि, अन्य जन्म के उपरान्त होने वाले लक्षणों का होना, स्त्रीलिंग
की उत्पत्ति में कारण है। इन लक्षणों से विपरीत लक्षणों का होना पुरुष की
उत्पत्ति मे कारण है। दोनों प्रकार के अवयव वा लक्षण नपुंसक की उत्पत्ति
में कारण हैं॥ १५ ॥
तस्य यत्कालमेवेन्द्रियाणि सन्तिष्ठन्ते, तत्कालमेवास्य चेतसि वेदना
निबन्धं प्राप्नोति, तस्मात्तदा प्रभृति गर्भः स्पन्दते प्रार्थयते च, तद्द्वै-
हृद्य्यमाचक्षते वृद्धा । मातृजं चास्य हृदय मातृहृदयेनाभिसम्बद्धं
भवति रसवाहिनीभि संवाहिनीभिः, तस्मात्तयोस्ताभिर्भक्तिः संप-
द्यते। तच्चैव कारणमवेक्षमाणा न द्वैहृद्य्यस्य विमानितं गर्भमिच्छन्ति
कर्तु, विमानने ह्यस्य दृश्यते विनाशो विकृतिर्वा, समानयोगक्षेमा हि
माता तदा गर्भेण केषुचिदर्थेषु । तस्मात्प्रियहिताभ्यां गर्भिणीं विशेषेणो-
पचरन्ति कुशलाः ॥ १६ ॥
गर्भ की इन्द्रिया जिस समय बनती है, उसी समय चित्त में सुख दुःख के
ज्ञान का सम्बन्ध भी हो जाता है। इसलिये तब से लेकर गर्भ स्पन्दन (गति)